जनवरी 2025, अंक 47 में प्रकाशित

समाजवादी यथार्थवाद के अलम–बरदार कवि गफूर गुलोम

मुझे यतनाएँ दी गयीं, क्योंकि मैं एक यहूदी हूँ, 

एक संख्या मेरी पहचान बना दी गयी

फेंक दिया गया मुझे आग में

मुझे यातनाएँ देकर गोली से उड़ा दिया गया

मैं एक यहूदी हूँ––––

यह एक गैर यहूदी कवि का साहसपूर्ण बयान है। उस समय का जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी और उसके सहयोगी लाखों यहूदियों का कत्लेआम कर रहे थे। उनके खिलाफ गफूर गुलोम की कलम किसी हथियार की तरह गरजती रही। उनकी यह कविता ‘आई एम ज्यू’ पीड़ित यहूदियों की शक्ति, सहनशीलता और दृढ़ता को बहुत प्रभावशाली तरीके से व्यक्त करती है जिसमें वह अपने आप को यहूदी कहते हैं और हिटलर की यातना से भी नहीं डरते हैं।

गफूर उज्बेकिस्तान के राष्ट्रीय कवि थे। उनका जन्म 10 मई 1903 को ताशकन्द के एक गरीब परिवार में हुआ था। उस समय उज्बेकिस्तान रूसी जारशाही के जुए के नीचे पिस रहा था। उनके वालिद गुलोम मिर्जा ओरिफ रूसी भाषा के जानकार थे। कविताएँ पढ़ना उनका शौक था और वह खुद भी शौकिया तौर पर कविताएँ लिखा करते थे। सिर्फ नौ साल की उम्र में गफूर गुलोम के वालिद का साया उनके सिर से उठ गया। यहीं पर उन्होंने मजदूरों–किसानों की जिन्दगी, उनकी समस्याओं और संघर्षों को देखा। आगे चलकर यह सब उनकी रचनाओं का प्रस्थान बिन्दु बना। उनकी एक कविता का अंश देखिए––

मन और कलम, 1945

कलम, खोखले शब्दों से बचो,

न पीछे रहो, न भागो!

हुक्म का पालन करो तुम

साहसी आत्मा के लोगों।

 

हरक्यूलिस बँधा हुआ है गड्ढे में,

जैसे कैद है मन अन्धेरे में।

लेनिन ने हमें सबसे तेज रोशनी दी,

जो दिमागों को उजाले से भर देती है।

गफूर गुलोम की शुरुआती पढ़ाई तुर्किस्तान में गैर–रूसी प्राथमिक विद्यालय से हुई थी। यह रूस में सर्वहारा क्रान्ति के झंझावात का दौर था। उन्होंने इस पूरे दौर के उतार–चढ़ाव को जिया, जो उनकी रचनाओं में साफ नजर आता है। यह उनके शिक्षण–प्रशिक्षण की दूसरी पाठशाला बनी। उनकी रचनाएँ किसानों–मजदूरों के संघर्ष की आवाज थी। सर्वहारा क्रान्ति की आवाज थी। सिकन्दर, चंगेज या फिर तैमूर जैसे दुनियाभर के रक्तपिपाशु हमलावरों के प्रति गफूर गुलोम की वर्गीय नफरत गाहे–बगाहे उनकी कविताओं में आती रही। अपनी इतिहास की कविता “ऑन द रूट्स ऑफ तुर्कशीब” (तुर्कसिब के रास्तों पर) में वे इसे लिखते हैं और इसी कविता के अन्त में चेतावनी भी देते हैं कि ऐसे शासक कल फिर आएँगे––

बीते हुए कल

अनादिकाल से

इस यात्रा में–––

यहाँ है रूमी और सिकन्दर,

रक्तपिपाशुु चंगेज,

जोची जगुआर,

और तैमूर,

सभी जीवों को नष्ट करते हुए

खून के प्यासे

खून के प्यासे

उग्र जैसे बर्फीले तूफान,

उठाते हैं तलवार

करते हैं तेजी से वार

एक के बाद एक

बीते हुए कल से

अनादिकाल से

इस यात्रा में–––

1917 को रूस की महान सर्वहारा अक्टूबर क्रान्ति सम्पन्न हुई। उसके बाद दुनिया में समाजवादी जनतंत्र और मानव मुक्ति का देश ‘सोवियत संघ’ अस्तित्व में आये। इसी दौर में गफूर गुलोम की औपचारिक और राजनैतिक शिक्षा जारी रही और उनकी रचनाएँ इन्कलाबी महासमर में अपनी भूमिका अदा करती रहीं। उन्होंने कम्बागल देहकोन (गरीब किसान), किजिल ओजबेकिस्तान (लाल उज्बेकिस्तान) और शर्क हकीकती (पूर्व का सच) जैसे विभिन्न प्रकाशनों के सम्पादकीय बोर्ड में काम करना शुरू किया। यहीं पर उन्होंने शिल्प की बारीकियों को समझना और पकड़ना सीखा। जिसकी छाप उनकी कविता पर साफ नजर आने लगी। शहीद लेनिन की याद में मन को द्रवित कर देने वाली अपनी विश्व प्रसिद्ध “सोगिनीश” (विदा लेना) कविता में वे लिखते हैं,

तोड़े हुए फूल की तरह, बुलबुल की तरह,

शाखाओं के बीच घोंसला छोड़ दिया,

नहीं रहे हमारे पिता अब हमारे बीच,

निधन हो गया, देश के प्यारे पिता का।

नहीं रोया पहले कभी मैं,

लेकिन इस क्षण

नहीं रोक सका कोई अपने अश्रु प्रवाह।

ओह, आँसू, आँसू––– नहीं, युलदाश–अता!

मृत्यु नहीं है अन्तिम पड़ाव।

सम्पादन के काम ने उन्हें समाजवादी यथार्थवाद के सिद्धान्तों को समझने में बहुत मदद की और समाजवादी यथार्थवाद को ही उन्होंने अपने साहित्य–सृजन की शैली के रूप में चुना। उनके साहित्य में सर्वहारा वर्ग का संघर्ष, संस्कृति और सोवियत समाज की सशक्त पहचान परिलक्षित होती है। जैसे–जैसे सोवियत समाज में सभी व्यक्तियों के लिए समानता और समृद्धि के द्वार खुलते जाते हैं, वैसे–वैसे उनके साहित्य और कविताओं में सामूहिकता और श्रम की गरिमा नये रूप लेते जाते हैं।

1923 में वे अनाथालय में पाठ्यक्रम विभाग के प्रमुख नियुक्त हुए। इसी समय उन्होंने अलेक्जेण्डर पुश्किन, व्लादिमीर मायकोवस्की और कई प्रभावशाली लेखकों–कवियों की रचनाओं का उज्बेक भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने पियरे ब्यूमार्चेस के ले मारियाज डे फिगारो, विलियम शेक्सपियर के ओथेलो और सादी शिराजी के गुलिस्तान का भी उज्बेक में अनुवाद किया। उनकी ‘शम बोला’ (द मिस्चीवस बॉय) कहानी को 1977 में फिल्म के लिए रूपान्तरित भी किया गया। ‘शम बोला’ और योडगोर (द लैगेसी) उनकी प्रसिद्ध कहानियों में से हैं।

वे युद्ध की विभीषिका के बारे में लगातार लिखते रहे। उनकी कविताएँ सेन येतिम इमासन (आप अनाथ नहीं हैं), ओल्टिन मेडल (गोल्डन मेडल), वक्त (समय), और सोगिनिश (हसरत) दुनियाभर मेंं बेहद लोकप्रिय हुर्इं।

1943 में वे उज्बेकिस्तान की विज्ञान अकादमी के सदस्य बने और वहाँ उन्होंने लम्बे वक्त तक काम किया। वे युवाओं को अलग–अलग विषयों, शिक्षण–प्रशिक्षण के तरीकों और विज्ञान के रहस्यों को जानने–समझने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। वे अपने विद्यार्थियों से कहते थे कि विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को जानो, उसके रहस्य को समझो, सृजनशील रहो और भविष्य के स्वप्न–द्रष्टा बनो। गफूर गुलोम के बारे में बोलते हुए विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार अब्दुल्ला कहोर कहते हैं कि उन्होंने साहित्य की दुनिया को आग की तरह जलाया और दूसरों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। जब हम उनके साहित्य पर नजर डालते हैं, तो यह बात तसल्ली से यह कह सकते हैं कि उन्होंने न केवल अपने दौर के बारे में लिखा, बल्कि उन सभी विषयों के बारे में भी लिखा जो आज भी प्रासंगिक हैं। उन्हें भविष्य की परवाह थी, उन्हें युवाओं के भविष्य से बहुत उम्मीदें थीं, वे चाहते थे कि युवा सभी क्षेत्रों में परिपक्व हों और इसके लिए वे उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने को तैयार थे। अपनी कविता लर्निंग फ्रॉम ईच अदर (एक दूसरे से सीखें) में गफूर गुलोम लिखते हैं,

गुरु तब खुश होते हैं जब

युवा छात्र उनसे आगे निकल जाते हैं,

क्योंकि विज्ञान हमेशा ही रहा

अपनी आँखों की पुतली की तरह

जिसे सम्भाला मैंने।

गफूर गुलोम ने अपने जीवन के अन्तिम 20 वर्षों में कई कविताएँ और पुस्तकें लिखीं। 1929 में ‘विण्टर एण्ड पॉयट्स’ (ठण्ड और कवि), 1930 में ‘ऑन द रूटस ऑफ तर्कशीब’ (तुर्कसिब के मार्गों पर), 1931 में ‘ब्रेड’ (रोटी), 1942 में ‘सेन येतिम इमासन’ (आप अनाथ नहीं हैं), 1943 में ‘कुजातिश’ (विदा कहना), 1945 में ‘वक्त’ (समय), 1950 में ‘सोगिनिश’ (हसरत), ‘लर्निंग फ्रॉम ईच अदर’ (एक दूसरे से सीखें) आदि उनकी विश्व प्रसिद्ध कविताएँ हैं।

गफूर गुलोम को अपने जीवन काल में कई पुरस्करों से सम्मानित किया गया। 1939 और 1963 में उन्हें दो बार ‘ऑर्डर ऑफ द रेड बैनर ऑफ लेबर’ का पुरस्कार मिला। उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द बैज ऑफ ऑनर’, ‘स्टेट स्तालिन पुरस्कार’, ‘लेनिन पुरस्कार’ आदि से पुरस्कृत भी किया गया। गफूर गुलोम को मिले ये सभी सम्मान सर्वहारा वर्ग और समाजवादी समाज के प्रति उनके अडिग विश्वास और समर्पण को दिखते हैं। 

10 जुलाई 1966 को उज्बेक के महान कवि, साहित्यकार और अनुवादक गफूर गुलोम अपना साहित्य सम्पूर्ण विश्व की जनता को सौंप कर दुनिया को अलविदा कह गये। पक्षधरता, राजनीति और व्यक्तिगत अनुभवों को कविताओं और साहित्य के जरिये अभिव्यक्त करने की उनकी कला अद्भुत थी। इन सब ने उन्हें अपने जीवनकल में और उसके बाद भी प्रासंगिक बनाये रखा। गफूर गुलोम उज्बेक साहित्य और समाजवादी यथार्थवाद के स्थापित हस्ताक्षर बने रहेंगे। उनकी कविता ‘नेवर फॉर्गेट’ (कभी मत भूलना) हमें उनकी हमेशा याद दिलाती रहेगी।

कभी मत भूलना झंझावात का वक्त,

धधकता युद्ध

कभी मत भूलना।

मन बदल गये जिन साथियों के युद्ध से––

फोन करना उन सभी को

कभी मत भूलना।

चमक उठी कोयले जैसी आँखों में

सुनहरी आग,

कभी मत भूलना।

जीत हमारी होगी, लेकिन मेरे साथी

जो शहीद दफ्न हो गये,

कभी मत भूलना।

“जिन्दाबाद जिन्दगी! साथियों को इन्कलाबी सलाम!”

हमारा युद्ध घोष

कभी मत भूलना।

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