व्लादिमीर मायाकोव्स्की की कविताएँ (संघर्ष और क्रान्ति का उद्घोष)
मैं जनता का नेता हूँ,
और साथ ही जनता का सेवक भी।
मेहनतकश हमारी ही आवाज में बोलता है,
हम सर्वहारा कलम के सिपाही हैं।
(कविता और टैक्स–इंस्पेक्टर)
कविता का यह अंश जिस कवि की कलमनवाजी का नजीर है और जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया, वह था व्लादिमीर मायाकोव्स्की। उनकी कविताओं में बीसवीं सदी की रूसी क्रान्ति की ज्वाला और मानवीय संवेदना की लौ एक साथ जलती थी। उनका जन्म 7 जुलाई 1893 को जॉर्जिया के बगदादी प्रान्त में हुआ था और उनके पिता वन अधिकारी थे। उन्हें बचपन में शब्दों और रंगों के संसार से अनूठा प्रेम था। कुताइसी में एक कलाकार ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें चित्रकला सिखायी।
जब 1905 की रूसी क्रान्ति की आँच पूरे रूस में फैल रही थी, उसी वक्त मास्को से लौटी उनकी बहन ने अपने साथ लायी क्रान्तिकारी पुस्तकें उन्हें भेंट किया। उन पुस्तकों ने मायाकोव्स्की के भीतर की चिंगारी को हवा दी और तब से रूस की मेहनतकश जनता का संघर्ष उनका संघर्ष बन गया।
लेकिन वक्त किसके लिए रुका है, उसका पहिया घूमा और इम्तिहान की घड़ी आयी, मायाकोव्स्की के पिता गुजर गये। वे अपनी माँ और बहनों के साथ मास्को चले आये। मास्को उनके लिए अनजान शहर था। न कोई रिश्तेदार, न कोई सहारा। उन्होंने पहले चित्रकला मे हाथ डाला, पर मन वहाँ नहीं रमा। फिर दर्शनशास्त्र का हाथ पकड़ा और वहीं से उनका मन मार्क्सवाद की ओर मुड़ चला। अब वे मजदूर वर्ग की पीड़ा और संघर्ष से खुद को अलग नहीं रख पाये। लेनिन की “टू टैक्सटिक्स” जैसी किताबों ने उनकी सोच को दिशा दी। स्कूल अब उनके लिए औपचारिकता मात्र था। उनका मन तो क्रान्ति की ओर उकाब की उड़ान उड़ चला था।
मात्र चैदह बरस की उम्र में उनका घर क्रान्तिकारियों का गोपनीय ठिकाना बन गया और पन्द्रह साल में वे बोल्शेविक पार्टी से जुड़ गये। क्रूर जारशाही उनके लिए नागवार थी। वे सत्ता–विरोधी गतिविधियों के चलते बार–बार जेल जाने लगे। 1909 में जब वे जेल में थे, तब वहीं से उनकी कविता का सफर शुरू हुआ।
वाक्य बुनता हूँ कठोर––
वाक्यों का जाल।
टंगे हैं जहाँ शहर
बादलों की धूसर फाँसी में,
मीनारें जहाँ
ठिठकी हुई गर्दनों से
झूल रही हैं ––
कभी चिकनी, अब टेढ़ी।
मैं अकेला चलता हूँ
शोक मनाने
उन सिपाहियों का
जो चैक पर
चढ़े हैं सूली पर।
ऐसी कविताएँ आगे चलकर मेहनतकश वर्ग की आवाज, क्रान्ति की धड़कन और शोषण के खिलाफ श्रम का औजार बनने वाली थीं। मायाकोव्स्की के लिए शब्द हथियार थे और रचनाएँ सर्वहारा वर्ग का स्वप्नलोक। जहाँ मनुष्य–मनुष्य का साथी हो और कला मेहनतकश की सेवा में तैनात। वे लिखते हैं, “कविता किताबों में नहीं, फैक्ट्रियों और सड़कों पर होनी चाहिए–– वहीं जहाँ जनता जीती है, काम करती है।”
1914 के साल ने पूरी दुनिया को प्रथम विश्व युद्ध के धमाकों से दहला दिया। जार ने इस युद्ध में रूस के मेहनतकशों को युद्ध की लपटों में झोंक दिया। जहाँ एक ओर शासक वर्ग दुनिया की बर्बादी पर शोहरत और मुनाफे की मीनारे खड़ी कर रहा था, वहीं दूसरी ओर युद्ध की विभीषिका ने जनता को झकझोर कर रख दिया। इस कत्लेआम और बर्बादी से वह व्यथित हो उठी। मायाकोव्स्की ने तब अपनी सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ ‘अ क्लाउड इन ट्राउजर’ और ‘कॉल टू अकाउण्ट’ लिखीं। जो प्रेम, विद्रोह और अस्तित्व की बुलन्द आवाज बन गयीं। सरकारी सेंसर ने उसके कई अंश उड़ा दिये, लेकिन जनता ने इसे एक घोषणापत्र की तरह पढ़ा।
मायाकोव्स्की ने ‘अ क्लाउड इन ट्राउजर’ कविता पर काम 1914 की शुरुआत में किया। उनके अनुसार यह कविता एक पत्र के रूप में पैदा हुई थी, जब वे ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। 1915 के जुलाई में उन्होंने इसे कूओक्काला में पूरा किया। शुरुआत में इसका नाम ‘द थर्टींथ अपॉसल’ था, लेकिन सेंसरों को यह शीर्षक और इसकी सामग्री आपत्तिजनक लगी। सेंसरशिप के दौरान कविता के छह पन्ने हटा दिये गये और शीर्षक भी बदलना पड़ा। बाद में मायाकोव्स्की ने बताया कि जब उनसे पूछा गया कि वे अपनी कविता में कोमल भावनाओं और रूखेपन को कैसे साथ रख सकते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, जरूरत पड़े तो वे उग्र बन सकते हैं और अगर कहा जाये तो इतने नरम कि “पतलून में बादल” बन जाएँ।
कविता के कुछ अंश 1915 में अलग–अलग पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए और उसी साल मायाकोव्स्की ने इसे कलात्मक गोष्ठियों में पढ़ा। एक कार्यक्रम में मैक्सिम गोर्की भी मौजूद थे। बाद में मायाकोव्स्की ने गोर्की को व्यक्तिगत रूप से इसके अंश सुनाए। गोर्की इस कविता से इतने भावुक हो गये कि उनकी आँखों से आँसू निकल आये। हालाँकि वे ‘फ्यूचरिस्ट’ कवियों के विरोधी माने जाते थे, फिर भी वे मायाकोव्स्की की प्रतिभा से प्रभावित थे। उन्होंने मायाकोव्स्की की कविता की प्रशंसा हुए चेताया कि इतनी तीव्र और विद्रोही तेवर को लम्बे समय तक बनाये रखना कठिन होता है। ‘जवाब चाहिए’ कविता में उनके विद्रोही तेवर को इन पंक्तियों में देखिए––
क्यों
एक फटा और खुरदरा
जूता धरती को रौंदता है ?
लड़ाइयों के आसमान के ऊपर क्या है ?––
स्वतंत्रता ?
ईश्वर ?
पैसा!
कब तुम उठोगे पूरी काया के साथ,
तुम, जो अपनी जान दे रहे हो ?
कब तुम उनके चेहरों पर सवाल उछालोगे––
क्यों लड़ रहे हैं हम ?
विश्व युद्ध खत्म न हो पाया था कि महान सर्वहारा अक्टूबर क्रान्ति के जरिये मेहनतकशों ने रूस में अपनी सत्ता कायम कर ली, जिसने व्लादिमीर मायाकोव्स्की को जोश और विश्वास से भर दिया। वे बोल्शेविक पार्टी के साथ पूरी तरह खड़े हो गये क्योंकि उस पार्टी ने ही क्रान्ति में जनता की अगुआई की थी और उसे जीत तक पहुँचाया था। उन्होंने कहा, “यह क्रान्ति हमारी है।” उनका नाटक ‘मिस्ट्री बूफ’ मजदूरों और सैनिकों की जुबान पर था। यह नाटक सिर्फ क्रान्ति की प्रतीक कथा नहीं था, बल्कि व्यवस्था पर किया गया तीखा व्यंग था। जहाँ इतिहास रंग–मंच पर बगावत और जनसंघर्ष कविता बन गया था। क्रान्ति के बाद मायाकोव्स्की ने कविता और नाटक को जनता की आवाज बना दिया।
रूप और शिल्प के स्तर पर भी वे मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की क्रान्तिकारी परम्परा को आगे बढ़ाते हैं। उनकी कविता सबसे पहले भाषा से टकराती है। उसकी भाषा कोमल नहीं है, फुसफुसाने वाली नहीं हैय वह मंच से चीखती है, उंगली उठाकर बोलती है, भीड़ को सम्बोधित करती है। उसकी पंक्तियाँ किसी इंकलाबी नारे की तरह आती हैं। शब्द ऐसे चुने जाते हैं मानो वे श्रोता के सीने पर मुक्का मार रहे हों। यह आक्रामकता केवल गुस्से से नहीं आती, बल्कि इस विश्वास से आती है कि कविता को निष्क्रिय सौंदर्य नहीं, सक्रिय हस्तक्षेप करना चाहिए। यह अभिजात पाठक–वर्ग के लिए नहीं, बल्कि जनसमूह के लिए रची गयी भाषा है। मायाकोव्स्की के यहाँ कवि एक कलाकार नहीं, एक वक्ता है–– सभा में खड़ा, जनता से सीधा संवाद करता हुआ।
इसी वजह से उसकी पंक्तियाँ अक्सर लम्बी, खिंची हुई और अनियमित होती हैं। वे पारम्परिक छन्दों की गुलाम नहीं हैं। लय टूटती है, फिर अचानक तेज हो जाती है, फिर रुक जाती है–– जैसे भाषण देते हुए कोई व्यक्ति भावावेश में रुक जाये, साँस ले और फिर और जोर से बोले। यह असमान लय, टुकड़ों में बँटी पंक्तियाँ और पोस्टरनुमा भाषा, दरअसल, उस अस्थिर समय की लय है जिसमें मायाकोव्स्की जी रहे थे–– औद्योगिक आधुनिकता, मशीनों की गति, क्रान्ति, गृहयुद्ध, टूटती पुरानी दुनिया और बनती हुई नयी व्यवस्था।
उनकी कविता में अनुशासन नहीं, टकराव हैय संतुलन नहीं, तनाव है। यही तनाव उनकी काव्य–संरचना में भी दिखाई देता है। वे बार–बार कहते हैं कि कविता को लड़ाई में उतरना चाहिए। उसके शब्द गोली की तरह, हथौड़े की तरह, पोस्टर की तरह काम करते हैं। उन्होंने कला को जनता की चेतना से जोड़ा। ‘ओडा रेवोलुत्सी’ (ओड़ टू रेवलूशन, 1918) और ‘लेवी मार्श’ (लेफ्ट मार्च, 1919) जैसी कविताएँ जनता के लिए आयतें बन गयीं।
आगे बढ़ो –– मार्च करो!
गरजों साथियो, बुलन्द आवाज से!
खामोश, भाषणबाजो!
अब बोलते हैं कॉमरेड माउजर
मंच अब तुम्हारा नहीं!
बहुत जी लिया आदम–हव्वा के कानूनों पर,
अब गिरा दो इतिहास का बूढ़ा घोड़ा ––
लेफ्ट!
लेफ्ट!
लेफ्ट!
ओ नीली पोशाक वाले नाविकों!
चीर दो समन्दर के तूफान को!
युद्धपोतों, भाप छोड़ो!
क्या तुम्हारी कीलें अब सुस्त पड़ गयी हैं ?
गरजने दो ब्रिटिश शेर को,
अपना ताज लहराने दो,
गूँगा हो जाएगा, बहरा हो जाएगा
लेकिन कम्यून कभी सर नहीं झुकाएगा!
लेफ्ट!
लेफ्ट!
लेफ्ट!
अब सबसे बड़ा सवाल था कि कैसे क्रान्ति की चेतना को जनता तक पहुँचाया जाये? उन्होंने इसके लिए एजिटप्रॉप को अपना माध्यम बनाया जो एजीटेशन और प्रोपगेंडा का अनोखा मिश्रण था। 1920 में पार्टी ने इस विभाग को स्थापित किया। इसका उद्देश्य था, “कला जनता के लिए और जनता के संघर्ष के लिए।” (सोवियत एजिटप्रॉप घोषणापत्र)
मजदूर वर्ग की संस्कृति को समाज तक ले जाने के लिए एजिटप्रॉप एक सशक्त माध्यम बना। इसने कला, नाटक, कविता, पोस्टर, फिल्म, अखबार और शिक्षा–– सबको एक साझा दिशा दी। व्लादिमीर मायाकोव्स्की एजिटप्रॉप के सबसे रचनात्मक और जीवन्त चेहरे बनकर उभरे। उनकी कविता में जोश, व्यंग्य और जनभाषा का अद्भुत संगम था। वे मंच पर बोलते भी थे और दीवारों पर लिखते भी थे। वे कवि और प्रचारक, कलाकार और उद्वेलक सब एक साथ थे। उनकी कल्पना और सृजनशीलता ने ‘रॉस्ता’ (रूसी टेलीग्राफ एजेंसी) के ‘ओखना रोस्ता’ को ऊर्जा से भर दिया। जहाँ पोस्टर–कला, व्यंग्य और कविता ने मिलकर जनसंवाद का नया रूप ले लिया––
“मजदूरो न उठाओ हाथ सुस्ती के लिए
तुम्हारे हथौड़े ही हथियार हैं क्रान्ति के लिए!”
उन्होंने नारे लिखे, चित्र बनाये और रंग भरे। कभी–कभी वे दिन के 60–80 नारे तक लिखते। यह जन कला का नया अवतार था, जहाँ शब्द और रंग दोनों हथियार थे। वे कम्युनिस्ट पार्टी के एक ओजस्वी प्रवक्ता भी थे। उन्होंने प्रचार–कविताएँ लिखीं, पूरे रूस में व्याख्यान और पाठ किये और बच्चों के लिए कई पुस्तिकाएँ तैयार कीं। फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले लिखे और कुछ में तो अभिनय भी किया। उन्होंने लिखा, “कविता वह है जो जीवन को आगे धकेलती है।”
बीस कॉन्फ्रेंस दिन में,
ऊपर से कुछ और
तो क्या करते ?
बाँट दिया अपने आपको, दो हिस्सों में!
ऊपर से कमर तक,
और बाकी वहाँ दूसरे कॉन्फ्रेंस में।
उड़ गयी है नींद बेचैनी से,
सुबह का इन्तजार करता हूँ पागलपन में
“काश!” मैं चीख पड़ता
“बस हो जाए
आखिरी कॉन्फ्रेंस एक और
सभी कॉन्फ्रेंसों को खत्म करने लिए!”
(इन रे कॉन्फ्रेंस)
लेनिन ने उनकी इस कविता की सराहना करते हुए कहा था, “मैं कविता का जानकार नहीं, पर राजनीतिक दृष्टि से यह उत्कृष्ट है।”
1924 में लेनिन की मृत्यु पर मायाकोव्स्की ने लम्बी कविता ‘व्लादिमीर इलविच लेनिन’ लिखी। जब उन्होंने यह कविता बोल्शोई थियेटर में सुनाई, तो पूरा हाल भावुक था, लेकिन फिर भी तालियाँ गूँज रही थीं। उन्होंने लिखा,
कोई बैठता है
कुछ देर धूप में
और झाड़ देता है
समुद्री काई,
चिपचिपाहट जेलिफिश की
अपने जहाज से।
मैं
जाता हूँ लेनिन के पास
अपनी नाव साफ करने,
ताकि क्रान्ति की यात्रा
शुरू कर सकूँ फिर से।
उन्होंने न केवल क्रान्ति की कविता लिखी, बल्कि कविताओं के जरिये प्रेम को भी घनीभूत रूप से प्रस्तुत किया। मायाकोव्स्की को लिलिया ब्रिक से प्रेम हुआ। उनके लिए वे सिर्फ एक प्रेमिका नहीं, बल्कि प्रेरणा स्रोत थीं। आगे चल कर लिलिया उनकी कविताओं का हिस्सा सा हो गयी।
“जहाँ दुनिया की टुंड्रा खत्म होती है,
वहाँ मैं तुम्हारा नाम पुकारता हूँ, लिलिया–––”
उनके प्रेम ने मायाकोव्स्की की कविताओं को रुहानियत से भर दिया। ऐसी कविताएँ जो विद्रोह और कोमलता, दोनों को एक साथ सम्भालती थीं। अपनी प्रेम कविताओं के चलते कई बार वे आलोचकों के सामने असहज हो जाते थे। रूसी सर्वहारा लेखक संघ जैसी संस्थाओं ने भी इस मामले में उनकी आलोचना की, लेकिन वे कहते, “मैं अपनी आत्मा को आलमारी में नहीं टाँग सकता।”
वे अखबारों, पत्रिकाओं और मंचों पर लगातार लिखते रहे। उन्होंने कहा, “मैं पत्रकार कवि हूँ और अपने समय की हर विसंगति पर कविता के जरिये टिप्पणी करना मेरा पेशा है।”
उन्होंने 1925 के बाद यूरोप, संयुक्त राज्य अमरीका, मेक्सिको और क्यूबा की यात्राएँ कीं। इनका अनुभव ‘माय डिस्कवरी ऑफ अमरीका’ (1926) और ‘खोरोश!’ (1927) में प्रकाशित हुआ।
मायाकोव्स्की की रचनाओं में द्वन्द्व भी है, जो उन्हें और अधिक मार्क्सवादी बनाता है क्योंकि मार्क्सवाद द्वन्द्व का दर्शन है। क्रान्ति के बाद उभरती नौकरशाही, औपचारिकतावाद और जड़ता से उनका संघर्ष दिखाता है कि वे समाजवादी व्यवस्था के अंध–समर्थक नहीं थे। उनकी “आलोचनात्मक निष्ठा” मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की उसी परम्परा में आती है जो समाजवादी सत्ता से भी सवाल पूछने का साहस रखती है।
सोवियत संघ में समाजवादी यथार्थवाद के दौर में मायाकोव्स्की की बेचैनी लगातार बढ़ती गयी। उन्हें सोवियत व्यवस्था के भीतर जड़ता, अवसरवाद और दिखावे की प्रवृत्ति नजर आने लगी। अन्तिम वर्षों में उनके यही अनुभव सोवियत समाज के प्रति गहरे द्वन्द का कारण बने। इसी दौरान उन्होंने दो नाटक लिखे, ‘द बेडबग’ (1929) और ‘द बाथहाउस’ (1930)। इनमें उन्होंने अपनी असहमतियों को व्यंग्यात्मक अन्दाज में सबके सामने रखा। इन रचनाओं को कई साहित्यिक प्रतिष्ठान की तरफ से आलोचना का सामना करना पड़ा। धीरे–धीरे उनका विरोधाभास गहरे असन्तोष और अकेलेपन मे बदल गया। सिर्फ 37 वर्ष की उम्र में 14 अप्रैल 1930 को उन्होंने खुद को गोली मार ली।
उनकी मृत्यु पर लाखों लोग सड़कों पर थे। रूस रो रहा था, उनका कवि अब चला गया था। लेकिन उसकी आवाज दीवारों, पोस्टरों और जनता की भाषा में तब भी गूँज रही थी।
उनकी मृत्यु के बाद भी सोवियत राज्य ने उनका हाथ नहीं छोड़ा। जोसेफ स्तालिन की नजर में वे “हमारे सोवियत युग के सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रतिभाशाली कवि थे।” जॉर्जिया में उनके जन्मस्थान बगदाती का नाम उनके सम्मान में मायाकोव्स्की रखा गया। 1937 में मास्को में मायाकोव्स्की के नाम पर एक संग्रहालय और पुस्तकालय स्थापित किये गये। मास्को का ट्रायम्फल स्क्वायर भी उनके सम्मान में मायाकोव्स्की स्क्वायर कहलाने लगा। 1938 में उनके नाम मायाकोव्स्काया मेट्रो स्टेशन जनता के लिए खोला गया। 1941 में कवि निकोलाई असेयेव को उनकी कविता ‘मायाकोव्स्की स्टार्ट्स हियर’ के लिए स्तालिन पुरस्कार दिया गया।
मायाकोव्स्की की कविता आज भी याद दिलाती है कि जनता से जुड़ी कला ही इतिहास बनाती है। उनकी कला हास्य, विद्रोह और सौन्दर्य का संगम थी और ये तीनों क्रान्ति के पक्ष में खड़े थे। उन्होंने लिखा,
भरे नहीं जख्म अभी बीते कल के,
और आज फिर
चमकती हैं धाराएँ नये रक्त की।
सभ्य नागरिक चीखता है
“त्रिकाल शापित हो यह क्रान्ति!”
और मैं ––
एक कवि ––
गर्जता हूँ ––
“त्रिकाल धन्य हो यह महाक्रान्ति!”
अपनी ऐसी कविताओं से वे आज भी जिन्दा हैं। वे जिन्दा रहेंगे अपनी कविताओं में, मजदूर वर्ग के संघर्षों में। वे तब तक जिन्दा रहेंगे, जब तक यह क्रान्ति त्रिकाल स्थापित नहीं हो जाती।
मायाकोव्स्की की कविता हर विद्रोही दिल में धड़कन की तरह धड़केगी। कवि होने का मतलब बताती रहेगी कि कविता कोई शब्दों का खेल नहीं, बल्कि वह है एक नैतिक, सामाजिक और आत्मिक साहस का काम है।
बस याद रखना है, उनकी ये पंक्तियाँ,
“कविता अगर सच्ची है,
तो वह दुनिया बदलती है ––
और कभी–कभी, कवि को भी।”
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