महिलाओं के खिलाफ एजेण्डे का पर्दाफाश
हालाते जिस्म, सूरते जाँ और भी खराब
चारों तरफ खराब, यहाँ और भी खराब।
रौशन हुए चिराग तो आँखें नहीं रहीं
अन्धों को रौशनी का गुमाँ और भी खराब।
– दुष्यन्त कुमार
हाल ही में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक महिला द्वारा अपने पति के कत्ल की दिल दहला देने वाली घटना घटी। महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर उसके शव के कई टुकड़े किये और बचने के लिए उन्हें एक बड़े ड्रम में भरकर उस में सीमेंट भर दिया। पुलिस के अनुसार महिला ने प्रेम–प्रसंग और नशाखोरी के चलते अपने पति की हत्या को अंजाम दिया। किसी भी संवेदनशील इनसान और समाज के लिए ऐसी घटना असहनीय है। इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
मेरठ की इस घटना की ओर आम जनता का सारा ध्यान खींचने के बाद ज्यादातर गोदी चैनल महिलाओं द्वारा की जाने वाली आपराधिक घटनाओं को चुन–चुन कर दिखाने लगे। इन घटनाओं का विश्लेषण करने के बजाय उन्होंने इसे टीआरपी, व्यूवर और सब्सक्राइबर बढ़ाने के सुनहरे मौके की तरह लिया। इसका असर यह हुआ कि सोशल मीडिया पर महिला विरोधी मिम्स, मैसेज और वीडियो की बाढ़ आ गयी। उन्हें देखकर ऐसा लगा है समाज की सारी महिलाएँ चरम स्वार्थी अमानवीय और हिंसक तथा अपने फायदे के लिए पुरुषों का इस्तेमाल करती हैं।
यह पहली बार नहीं है कि जब महिलाओं को अपराधी की तरह पेश करने वाली घटना को गोदी मीडिया ने इतने घिनौने तरीके से उछाला हो। इससे पहले पत्नी द्वारा प्रताड़ित करने पर बेंगलुरु के इंजिनियर अतुल सुभाष की आत्महत्या और आईएस बनने पर चैकीदार पति को छोड़ने वाली ज्योति मौर्य के मामलों को भी गोदी मीडिया ने ऐसे ही उछाला था। इसके बाद महिला विरोधी गिरोह अपवाद स्वरूप होने वाली ऐसी चन्द घटनाओं का खुलकर प्रचार करने लगे जिसका असर यह हुआ कि इन गिरोहों को लोगों का खुला समर्थन मिलने लगा। महिला विरोधी बातें मुखरता से उठने लगीं। ऐसे में जरूरी है कि इनके पीछे के सही कारणों को तलाशा जाये।
सामन्ती मूल्य–मान्यताओं के साथ निर्णायक संघर्ष न होने के चलते आज भी हमारे समाज में पुरुषवादी मानसिकता हावी है। इस पर नवउदारवादी नीतियों ने बाजारवाद, उपभोक्तावाद और स्वार्थपरता को बेलगाम बढ़ाने का काम किया है। यह कोढ़ में खाज बन गया। इसके चलते समाज में आपराधिक और हिंसक सोच में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। फिर भी आज की सच्चाई यह है कि पुरुष अपराध के मामले में महिलाओं से बहुत आगे हैं। हालाँकि समय के साथ महिलाएँ भी अपराध की तरफ मुखातिब हो रही हैं। कुछ निर्मम अपराधिक घटनाओं में उनकी भूमिका नजर आती है। हालाँकि वे ऊँट के मुँह में जीरे के बराबर भी नहीं हैं, लेकिन मीडिया और पुरुषवादी व्यक्ति ऐसी चुनिन्दा घटनाओं के जरिये महिलाओं को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।
क्या ऐसी आपवादिक घटनाओं के जरिये सभी महिलाओं को दोषी और धोखेबाज ठहराना ठीक है? क्या इसी तर्क के आधार पर सभी पुरुषों को अपराधी बताना ठीक होगा? इस तरह की सोच नस्लवादी, साम्प्रदायिक और संकीर्णतावादी होती है, जब हम व्यक्ति के किसी अपराध के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहरा देते हैं। जब आप पूरे महिला समुदाय को दोषी ठहरा रहे होते हैं तो महिलाओं के ऊपर अत्याचार करने वालों को बहाना दे देते हैं कि वे अत्याचार जारी रखें।
पिछले तीन दशकों में बाजारवाद ने महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में पेश किया है। इसके चलते महिलाओं के खिलाफ आपराधिक घटनाओं में बेहद बढ़ोतरी हुई है। छोटी बच्चियों से लेकर बुजुर्ग औरतों को यौन हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है। सामूहिक बलात्कार, कार्यस्थल पर यौन शोषण, वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करना, सिनेमा में परोसी जाने वाली अश्लीलता और पोर्न फिल्में आदि, लिस्ट बहुत लम्बी है। फिर भी उनकी हिम्मत को तोड़ा नहीं जा सका। वे जीवन के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। उनकी यही जीवटता और संघर्षशीलता महिला विरोधी तत्वों की आँखों की किरकिरी बनी हुई है। ऐसे लोग उपरोक्त घटनाओं का सहारा लेकर सारी महिलाओं को चरम स्वार्थी, धनलोलुप और धोखेबाज घोषित करने पर तुले हुए हैं। वे महिला विरोधी चरम नफरत से संचालित हो रहे हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि उन्हें जन्म देनेवाली एक महिला ही है।
वे महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने की कोशिश करते हैं। इसके लिए महिलाओं को ही दोषी ठहराते हैं। उनमें से कुछ लोग कभी–कभी प्रगतिशीलता का नकाब ओढ़ लेते हैं और अपनी महिला विरोधी सोच को छिपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन इनकी हरकतों से समझ में आ जाता है कि दाल में कुछ काला है। जब वे सोशल मीडिया पर महिला विरोधी सन्देश फैलाने लगते हैं, तब खुद को बेनकाब कर लेते हैं। वे समाज में महिलाओं पर रोज–रोज हो रहे अत्याचार की अनदेखा करते हैं और उल्टे उन्हें ही सबसे बड़ा गुनहगार साबित करते हैं। आज कुछ महिलाएँ अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का विरोध करती हैं। इसलिए वे पुरुषवादी मानसिकता से ग्रसित लोगों की आँखों में चुभती हैं। ऐसे पुरुष महिलाओं से सम्बन्धित अपराध की इक्का–दुक्का घटनाओं को आम प्रवृति बताकर अपने स्त्री द्वेष और कुण्ठा का इजहार करते हैं। ऐसे में महिलाओं के प्रति स्वस्थ नजरिया बना पाना और भी मुश्किल हो जाता है।
बलात्कार के आरोपी राम रहीम और आशाराम की गिरफ्तारी पर हिंसा भडकना या उन्हें आसानी से बेल मिलना, सामूहिक बलात्कार के आरोपियों के जेल से छूटने पर फूलमालाओं से स्वागत करना, आठ साल की बच्ची के साथ रेप करने वाले आरोपी के पक्ष में तिरंगा यात्रा निकालना, अंकिता हत्याकाण्ड के सबूत मिटाने के लिए घटनास्थल को राज्य सरकार द्वारा बुलडोजर से ढहा देना और न जाने ऐसी कितनी अनगिनत घटनाएँ रोज घट रही हैं जिनके खिलाफ व्यापक स्तर पर विरोध जारी है, लेकिन महिला विरोधियों के लिए ये बातें कोई मायने नहीं रखतीं। मुख्यधारा का मीडिया भी इसे ज्यादा तवज्जो नहीं देता है। उल्टा इस पर पर्दापोशी करता है।
हमारे समाज की सोच में स्त्री विरोध गहरे से बैठा हुआ है जिसकी मौजूदगी अक्सर व्यवहार में देखने को मिलती रहती है। आज महिलाएँ जागरूक होकर, पितृसत्तात्मक सोच के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द कर रही हैं। पुरुषों को भी उनकी आवाज के साथ अपनी आवाज मिलानी होगी। तभी एक स्वस्थ समाज की बुनियाद रखी जा सकेगी।
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