अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

सोशल मीडिया पर हिन्दुत्ववादियों का जाल और जंजाल

7 अगस्त को रांची में विधानसभा घेराव करने जा रहे छात्रों के समर्थन में निकाले गये मार्च के दौरान नेहा बोरा पर एक व्यक्ति ने स्याही फेंकी। उसने नेहा बोरा को “एण्टी नेशनल” और उमर खालिद का समर्थक बताया। यह घटना सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे धार्मिक उन्माद का नतीजा है। यह अब सिर्फ मोबाइल स्क्रीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़कों पर भी दिखाई देने लगा है। असहमति का जवाब बहस और तर्क से नहीं, बल्कि हिंसा से दिया जा रहा है।

महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा है–– “अश्वत्थामा मारा गया।” इस अधूरी खबर ने पूरे युद्ध की दिशा बदल दी थी। आज भाजपा आईटी सेल डिजिटल मीडिया, खासकर सोशल मीडिया पर झूठी, अधूरी और भ्रामक खबरें तेजी से फैला रहा है। ऐसी खबरें कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती हैं और लोगों की सोच के साथ–साथ पूरे समाज के माहौल को भी दूषित करती हैं।

2022 में हनुमान जयन्ती के दौरान जहाँगीरपुरी में हिन्दू–मुस्लिम तनाव के बीच व्हाट्सऐप, फेसबुक और ट्वीटर ने झूठी बातें फैलाने का काम किया। भ्रामक और पुरानी वीडियो क्लिप्स, नारे आदि ने साम्प्रदायिक दंगे को बढ़ावा दिया और वहाँ पथराव हुआ, जिसमें नौ लोग घायल हुए। ऐसी घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। मध्य प्रदेश के खरगोन, गुजरात के साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर से लेकर देश के कई इलाकों से साम्प्रदायिक हिंसा की ऐसी खबरें लगातार आती रहती हैं।

गोदी मीडिया के न्यूज चैनल तुरन्त इन खबरों का ढिंढोरा पीटना शुरू कर देते हैं। ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान उन्होंने तो हद ही कर दी। ऐसे–ऐसे वीडियो दिखाये जा रहे थे, जिनमें पाकिस्तान के कराची, इस्लामाबाद और लाहौर से लेकर भारत के श्रीनगर और जयपुर एयरपोर्ट तक में बमबारी दिखाई जा रही थी। ये सभी फर्जी वीडियो क्लिप्स थीं, जो पूरे देश में नफरत की राजनीति परोस रही थीं। बाद में खबरों के गलत साबित होने पर ये बेशर्मी से तरह–तरह के कुतर्क करने लगे।

आज कमोबेश यही हाल पूरी दुनिया में सोशल मीडिया का है। 2022 में ब्रिटेन के लीसेस्टर शहर में हिन्दू और मुस्लिम युवाओं के बीच हुई हिंसा सोशल मीडिया पर फैले एक वीडियो से ही भड़की थी।

सोशल मीडिया पर एक अफवाह या झूठी खबर छोड़ी जाती है और देखते ही देखते लाखों–करोड़ों लोगों के बीच भ्रम, डर और गुस्से की स्थिति पैदा हो जाती है। कोरोना के बाद से ही इस तरह की साम्प्रदायिक, भ्रामक और नफरत फैलाने वाली पोस्ट और रील  की बाढ़ आ गयी है। खास तौर पर हिन्दुत्ववादी नफरत से भरे, साम्प्रदायिक माहौल बनाने वाले और इनसान–इनसान में भेद पैदा करने वाली सामग्री और वीडियो बड़ी संख्या में सामने आने लगे हैं।

चुनावों में सोशल मीडिया प्रचार का प्रमुख माध्यम बन गया है। आज बीजेपी मोबाइल पर मिस्ड कॉल और मैसेज के जरिये सदस्यता बढ़ाती है। व्हाट्सऐप ग्रुप और फेसबुक पेज बनाकर लोगों तक झूठी, भ्रामक और साम्प्रदायिक सामग्री पहुँचायी जाती है और नफरती राजनीति का जाल फैलाया जाता है। स्थानीय चुनावों से लेकर लोकसभा के चुनावों तक इसका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।

कुछ महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी “कट्टर हिन्दू हम हैं, नहीं तो हमको काट दिया जाता, अपना मत भगवा को दें” और “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं, हमारा वोट भगवा को” जैसे नारों वाले पोस्ट, स्टेटस, रील आदि धड़ल्ले से सोशल मीडिया पर भेजे गये। इसके चलते समाज में हिन्दू–मुसलमान के बीच नफरत बढ़ती है, यह बात किसी से छुपी नहीं है।

किसान, मजदूर और छात्र–नौजवानों के आन्दोलन के दौरान मोदी सरकार की बहुत फजीहत हुई। सोशल मीडिया ने इसमें अहम भूमिका निभायी। इसके चलते सरकार सोशल मीडिया पर नये–नये कानूनों के जरिये लगातार नियंत्रण करने पर तुली है। एक ओर हिन्दुत्ववादी प्रोपेगेण्डा को खुली छूट दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर विरोध की आवाजों को दबाया जा रहा है। इनका ब्रह्मवाक्य है, “हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कैरेक्टर ढीला।”

यह साफ है कि जिसके हाथ में सत्ता है, उसके पास मुख्य धारा की मीडिया के साथ ही सोशल मीडिया की ताकत भी है। इसलिए आज जरूरत ऐसे स्वतंत्र मीडिया और सोशल मीडिया की है, जो सत्ता के दबाव में न हो, सच्चाई को सामने रखे और नफरत व भेदभाव की राजनीति के बरखिलाफ आम जनता के मुद्दों और उनकी समस्याओं को सही प्लेटफॉर्म दे सके। ऐसे मीडिया की जरूरत है जो जन–विरोधी शासक वर्ग पर सवाल उठाये और उनका भण्डाफोड़ करे। कोरोना महामारी के बाद के आन्दोलनों ने इस मीडिया की ताकत और जरूरत को हमारे सामने रखा है। यह आज जनता की आवाज बन सकता है।

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