मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

निजी संस्थानों में शिक्षकों का बेलगाम शोषण–उत्पीड़न

आज देश के निजी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय तेजी से मुनाफा–केन्द्रित संस्थानों में बदलते जा रहे हैं। बाहरी चमक–दमक और आधुनिक सुविधाओं के पीछे एक ऐसी वास्तविकता छिपी है, जिसका सबसे अधिक असर इन संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों पर पड़ता है। शिक्षकों से निर्धारित कार्य अवधि से कहीं अधिक समय तक काम लिया जाता है। कई बार उन्हें अतिरिक्त काम घर पर करना पड़ता है। अब उनका काम केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़ाना उनके काम का छोटा हिस्सा है। बड़ा हिस्सा गैर–शैक्षणिक कामों में खप जाता है। शिक्षक क्लर्क, डेटा ऑपरेटर, तो कभी इवेंट मैनेजर की भूमिका निभाने को मजबूर हैं। कई संस्थान तो उन्हें मार्केटिंग गतिविधियों में भी झोंक देते हैं। जहाँ फोन कॉल के जरिये नये एडमिशन लाने का दबाव बनाया जाता है। इस तरह “मल्टीटास्किंग” के नाम पर डाले गये काम के बोझ ने शिक्षकों को मानसिक दबाव में पहुँचा दिया है।

काम के बोझ के साथ कम वेतन मिलता है और नौकरी बहुत अपमानजनक है। वेतन के नाम पर क्रूर मजाक चल रहा है। 18 जनवरी 2024 को टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की एक रिपोर्ट इस शोषण की स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। उसके अनुसार उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में छोटे निजी प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक 5,000 से 8,000 रुपये मासिक वेतन पर काम करने को मजबूर हैं। जबकि उनसे प्रतिदिन लगभग 10 घण्टे काम लिया जाता है। सातवें वेतन आयोग के बाद सरकारी शिक्षक काफी बेहतर स्थिति में हैं। वहीं निजी शिक्षक गम्भीर आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। बीएड और टीईटी जैसी योग्यताओंे के बावजूद सम्मानजनक वेतन न मिलना, नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाना, एकतरफा शर्तों पर ठेका आधारित नियुक्तियाँ, “हायर एण्ड फायर” का भय, नौकरी की अस्थिरता और असुरक्षा शिक्षक के जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुकी हैं।

पहले से मौजूद शोषण–उत्पीड़न को डिजिटल माध्यमों ने और गहरा बना दिया है। स्मार्टफोन और व्हाट्सएप्प ग्रुप्स के जरिये शिक्षक के कार्य–समय और निजी जीवन के बीच की सीमाएँ धुँधली हो गयी हैं। अब शिक्षक दिन–रात किसी भी समय मालिक की सेवा में उपलब्ध रहने के लिए बाध्य हैं। अभिभावकों और प्रबन्धन की ओर से लगातार सन्देश और कॉल आते रहते हैं। यहाँ तक कि देर रात 10–11 बजे भी जवाब देने की अपेक्षा की जाती है। गु्रपों में सक्रिय रहने के निर्देश दिये जाते हैं और मना करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। इस निरन्तर निगरानी और उपलब्धता ने शिक्षक को मानसिक रूप से परेशान कर दिया है। जहाँ उसकी निजी जिन्दगी बर्बाद हो गयी।

इनका सबसे गम्भीर प्रभाव शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। काम का बोझ, आर्थिक असुरक्षा और सम्मान की कमी मिलकर एक गहरे मानसिक संकट को जन्म दे रहे हैं। “टीचर वेल–बीइंग इण्डेक्स 2025” के अनुसार, 77 प्रतिशत शिक्षक काम के बोझ के चलते तनाव और चिन्ता का अनुभव कर रहे हैं, जबकि 36 प्रतिशत अवसाद का खतरा उठा रहे हैं।

यह स्थिति इसलिए और चिन्ताजनक है क्योंकि शिक्षण एक ऐसा पेशा है, जो धैर्य, संवेदनशीलता और रचनात्मकता की माँग करता है। लेकिन जब शिक्षक खुद ‘बर्नआउट’ की स्थिति में हो, तो वह अपने सकारात्मक गुणों को कैसे बचाये रखेगा? लगातार दबाव न केवल उसकी पेशेवर क्षमता को, बल्कि उसके निजी जीवन को भी बुरी तरह प्रभावित करता है। परिवार के लिए समय की कमी, रिश्तों में दूरी और बढ़ता अकेलापन इस संकट को और गहरा बना रहे हैं। इस प्रकार, शिक्षकों की यह स्थिति अब केवल एक पेशागत समस्या नहीं रह गयी है, बल्कि धीरे–धीरे एक व्यापक सामाजिक संकट का रूप लेती जा रही है।

कुल मिलाकर उसकी हालत दिहाड़ी मजदूर से भी खराब हो गयी। मजदूरों की तरह वह भी मशीन का पुर्जा बना दिया गया। इनसान के रूप में उसका अस्तित्व मिटता जा रहा है। ऐसा इसलिए है कि मौजूदा शिक्षा–व्यवस्था मुनाफा कमाने के लिए है न कि इनसान को वैज्ञानिक ज्ञान और चेतना से लैस करने के लिए। शिक्षा बाजार में बेचने–खरीदने का माल बन गयी है और शिक्षक सस्ता मजदूर। उसकी श्रम–शक्ति माल बन गयी है, जब वह अपने श्रम को बेच देता है तो वह उससे बेगाना हो जाता है और उसका मालिक कोई और बन जाता है। उसका मालिक होता है शिक्षा जगत में मुनाफे का भूखा भेड़िया जो शिक्षकों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करता है। वह शिक्षकों की जवानी के बेहतरीन 10–15 सालों को चूस लेता है और अन्त में उसे दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देता है।

 इसलिए जब तक इस मुनाफे पर टिकी व्यवस्था पर चोट नहीं की जाती, तब तक शिक्षकों की हालत में कोई बुनियादी सुधार नहीं होगा।

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