अमरीका–ईरान युद्ध में पेट्रो–डॉलर की भूमिका
3 जनवरी, 2026 को अमरीका ने अन्तरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर को ताक पर रखकर वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया था। इस घटना के कुछ दिन बाद ही 28 फरवरी 2026 को अमरीका ने एक दूसरी बड़ी साम्राज्यवादी कार्रवाई को अंजाम दिया। उसने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर दिया। रातों–रात तेहरान के आसमान में मिसाइलों की बारिश कर दी गयी। ईरान के एक स्कूल पर बम गिराकर अमरीका ने वहाँ पढ़ रही 165 निर्दाेष बच्चियों तक की निर्मम हत्या करने से भी गुरेज नहीं किया। इस युद्ध में अब तक हजारों ईरानी नागरिक अपनी जान गँवा चुके हैं। इस साल की शुरुआत से ही ‘तथाकथित लोकतंत्र और मानवाधिकार’ का झण्डाबरदार अमरीका सभी अन्तरराष्ट्रीय कानूनों को रौंदता हुआ निर्दाेष लोगों की हत्याएँ कर रहा है।
ईरान पर हमले के पीछे उसके परमाणु कार्यकर्मों को खत्म करना बताया गया। दरअसल, ईरान लम्बे समय से रूस और चीन के साथ गैर–डॉलर मुद्राओं में तेल का व्यापार कर रहा है जो अमरीकी वर्चस्व को चुनौती देता है। इससे अमरीकी हित प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या अमरीका ने अपने डॉलर वर्चस्व बचाने के लिए ईरान और वेनेजुएला पर हमले किये हैं? क्या अनेक देशों पर अमरीकी टैरिफ में बढ़ोतरी भी उसकी गिरती साख को थामने की असहाय कोशिश है? क्या ब्रिक्स और अन्य देशों द्वारा डॉलर मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने के चलते अमरीकी चैधराहट संकट में है और एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था और पेट्रोडॉलर व्यवस्था में दरार पड़ रही है?
पिछले 50 वर्षों से अमरीका के लिए पेट्रोडॉलर व्यवस्था महत्वपूर्ण रही है। इसकी शुरुआत 1974 में अमरीका और सऊदी अरब के बीच एक समझौते के तहत हुई थी। इस समझौते के अनुसार सऊदी अरब केवल डॉलर में ही तेल का व्यापार करेगा और इस शर्त के बदले अमरीका सऊदी अरब को सैन्य सुरक्षा और हथियार उपलब्ध करायेगा। सऊदी अरब के साथ अन्य तेल निर्यातक देश भी कुछ समय बाद डॉलर–व्यापार के अधीन हो गये थे। इसके चलते डॉलर और अमरीका वैश्विक व्यापार का केन्द्र बना गया था।
ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल उद्योगों के लिए कच्चे माल की जरूरतों ने सभी देशों को मजबूर किया कि वे डॉलर में व्यापार करें। अमरीकी चैधराहट वाली विश्व व्यवस्था में किसी देश के पास डॉलर नहीं है तो वह वैश्विक व्यापार श्रृंखला से कट जाएगा। अमरीकी महाशक्ति डॉलर–केन्द्रित है। मध्यपूर्व के देश अपने डॉलर को वापस अमरीकी बॉण्ड में निवेश कर देते हैं। इसे डॉलर रीसाइक्लिंग कहा जाता है जिसमें डॉलर की माँग हमेशा बनी रहती है। अमरीका डॉलर छापकर गरीब और विकासशील देशों से कच्चा तेल, खनिज और श्रम निचोड़ता रहता है। यह एक ऐसा चक्र है जहाँ दुनिया की मेहनतकश जनता अपने श्रम से पूँजी पैदा कर रही है तथा अमरीका, उसके साम्राज्यवादी सहयोगी और तीसरी दुनिया के शासक जनता के श्रम से पूँजी निचोड़ रहे हैं। अमरीकी चकाचैंध का राज यही लूट है। इसी के दम पर अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी सेना रख पा रहा है, अपने कर्ज को सस्ती दरों पर वित्तपोषित कर रहा है और पूरी दुनिया पर अपने प्रतिबन्ध थोप पा रहा है।
अमरीका की चकाचैंध, सम्पन्नता और विशाल सैन्य शक्ति इसी वैश्विक शोषण और अन्यायपूर्ण वित्तीय ढाँचे पर टिकी है। इस व्यवस्था के केन्द्र में ‘डॉलर’ है, जो केवल एक मुद्रा नहीं, बल्कि दुनिया के संसाधनों को अमरीका की ओर खींचने वाला एक शक्तिशाली यंत्र है। अमरीका का राष्ट्रीय कर्ज अब लगभग 3,250 लाख करोड़ रुपये के पार कर गया है। यानी हर अमरीकी नागरिक पर लगभग 95 लाख रुपये का कर्ज। इसके बावजूद अमरीका केवल रक्षा बजट पर करीब 125 लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा सैन्य खर्च है। यह सब ‘पेट्रोडॉलर’ के चलते सम्भव है। दुनिया भर से लूटकर अमरीका युद़्ध और विलासिता पर हजारों अरब डॉलर उड़ा रहा है।
साल 2000 में सद्दाम हुसैन द्वारा अपने देश के तेल को डॉलर की जगह यूरो में बेचने की घोषणा करने पर, इराक पर हमला किया गया, उन्हें गिरफ्तार कर फाँसी पर चढ़ा दिया गया था। अपने कृत्य को जायज ठहराने के लिए अमरीका ने सद्दाम हुसैन पर गुप्त रूप से खतरनाक रसायनिक हथियार बनाने का इल्जाम लगाया जो अब झूठा साबित हो चुका है। इसी तरह साल 2009 में लीबिया के राष्ट्रपति गद्दाफी पर अफ्रीकी मुद्रा में तेल व्यापार को प्रोत्साहित करने के बाद अमरीका ने ‘नागरिक अधिकारों की रक्षा’ के नाम पर लीविया पर किया और गद्दाफी की हत्या करवा दी।
किसी देश को आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने की धमकी देकर अपनी नीति मनवाना अमरीका की रणनीति रही है। यह रणनीति सैन्य ताकत से भी ज्यादा प्रभावी है। इन प्रतिबन्धों के चलते उस देश को पूरी दुनिया से काट दिया जाता है जिससे वहाँ की जनता दवाओं की कमी, साफ पानी की कमी, खाद्य असुरक्षा के कारण तिल–तिल कर मरने को मजबूर हो जाती है। आज भी अमरीका ने रूस, ईरान, सीरिया, उत्तर कोरिया, क्यूबा, वेनेजुएला, म्यांमार, इराक समेत 28 से ज्यादा देशों पर व्यापार और वित्तीय प्रतिबन्ध लगा रखा है। इसने न्यूक्लियर, बायोलॉजिकल और रासायनिक हथियारों से भी ज्यादा लोगों की जान ली है। 2025 में प्रकाशित ‘द लेंसेट ग्लोबल हेल्थ’ के अध्ययन के अनुसार 1970 से लेकर 2021 के बीच अमरीका और यूरोपीय संघ द्वारा लगाये गये एकतरफा प्रतिबन्धों के कारण 3 करोड़ 80 लाख लोगों की मौत हुई है जिनमें आधे से ज्यादा 5 साल से कम उम्र के बच्चे थे। केवल इराक में ही जरूरी दवाइयों के आयात पर रोक लगाकर 5 लाख से ज्यादा बच्चों की हत्या कर दी गयी है। यह इतिहास के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक है।
आज पेट्रोडॉलर व्यवस्था को तीन तरफ से चुनौती मिल रही है। पहला, डॉलर से अलग मुद्राओं में होने वाले तेल के व्यापार में ऐतिहासिक बढ़ोतरी नजर आ रही है। रूस और ईरान जो वैश्विक तेल आपूर्ति का 14 फीसदी हिस्सा रखते हैं वह डॉलर की जगह अन्य मुद्राओं में तेल बेच रहे हैं। इसके साथ ही सऊदी अरब अब अमरीका की तुलना में चीन को चार गुना अधिक तेल निर्यात कर रहा है, इस व्यापार में युआन ने डॉलर को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अप्रैल 2026 तक मध्य–पूर्व से चीन को होने वाले तेल व्यापार में युआन की हिस्सेदारी अब ऐतिहासिक तरीके से बढ़कर 41 फीसदी तक पहुँच गयी है। पिछले 50 साल में पहली बार किसी गैर–डॉलर मुद्रा में तेल का व्यापार इतने बड़े स्तर तक पहुँच गया है। यह साफ है कि तेल व्यापार में अब डॉलर का एकाधिकार धीरे–धीरे ही सही, लेकिन कमजोर हो रहा है।
दूसरा, डॉलर के वैश्विक भण्डारण में अभूतपूर्व कमी आ रही है। अमरीका ने यह विश्वास बनाया था कि दुनिया की सबसे विश्वसनीय मुद्रा डॉलर है लेकिन अब यह विश्वास कमजोर होता नजर आ रहा है। वैश्विक भण्डारण में डॉलर का हिस्सा साल 2000 के 71 फीसदी से गिरकर साल 2025 के अन्त तक 56 फीसदी पर आ गया है। ‘वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल’ के सर्वेक्षण के अनुसार 73 प्रतिशत केन्द्रीय बैंकों का मानना है कि अगले पाँच वर्षों में यह और घटेगा। दुनिया के अधिकांश केन्द्रीय बैंक अब सोना खरीद रहे हैं और डॉलर बेच रहे हैं। यह गिरावट 2022 में अमरीका द्वारा रूस के 300 अरब डॉलर के भण्डार को जबरन जब्त करने के बाद और तेज हुई है। इस जब्ती ने यह दिखा दिया कि डॉलर में रखी सम्पत्ति पर अमरीका का एकाधिकार है जिसे वह जब चाहे खत्म कर सकता है। इसी डर के चलते अनेक देश डॉलर के विकल्प के तौर पर दुबारा सोने की तरफ लौट रहे हैं। 1996 के बाद, पहली बार 2025 में, सोने का हिस्सा अमरीकी सरकारी बॉन्ड से अधिक हो गया। यह डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व पर बड़ा आघात है।
अमरीकी वित्तीय एकाधिकार को तीसरी और सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक भुगतान प्रणाली के स्तर पर उभर रही है। दशकों पुरानी ‘स्विफ्ट’ यानी विश्वव्यापी अन्तरबैंक वित्तीय दूरसंचार व्यवस्था, जिसपर अमरीकी नियन्त्रण है अब उसके विकल्प नजर आ रहे हैं। मार्च 2026 में चीन की सीआईपीएस भुगतान प्रणाली ने एक ही दिन में 1220 अरब युआन लगभग 178–5 अरब डॉलर का रिकॉर्ड लेनदेन दर्ज किया, जो 2024 की तुलना में चार गुना अधिक है। यह केवल चीन तक सीमित नहीं है बल्कि ‘एमब्रिज’ प्लेटफॉर्म पर चीन, हांगकांग, थाइलैण्ड, यूएई और सऊदी अरब के केन्द्रीय बैंक डॉलर के बिना ही ‘सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी’ में प्रत्यक्ष व्यापार कर रहे हैं। अक्टूबर 2024 तक इस पर 55 अरब डॉलर के 4,000 से अधिक लेनदेन हो चुके थे, जो 2022 की तुलना में 2,500 गुना की वृद्धि है।
यह एक ऐसा मंच उभर रहा है जो पूरी तरह से अमरीकी मध्यस्थों को दरकिनार करते हुए रुपया, युआन, रूबल और रियाल जैसी स्थानीय मुद्राओं में सीधे व्यापार को सम्भव बना रहा है। इस रणनीति का नेतृत्व ब्रिक्स और उसके गठबन्धन मिलकर कर रहे हैं। यह गठबन्धन अब वैश्विक आबादी का लगभग आधे हिस्से और वैश्विक जीडीपी के लगभग 40 फीसदी का प्रतिनिधित्व करता है। जब इतनी बड़ी ताकत एक साथ डॉलर से दूरी बना रही है तो यह कोई छोटा बदलाव नहीं है। इसी हड़बड़ाहट में वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण किया गया है। यही कारण है कि ईरान पर बम गिराये जा रहे हैं। यही कारण है कि ब्रिक्स और उनके करीबी देशों पर प्रतिबन्धों की बौछार की जा रही है। लेकिन विडम्बना यह है कि प्रतिबन्ध जितने कठोर हो रहे हैं, दुनिया उतनी ही तेजी से डॉलर से दूर भागती नजर आ रही है।
इन्हीं वैश्विक परिस्थितियों में अमरीका और डॉलर के वर्चस्व पर हो रहे घात–प्रतिघात को केन्द्र में रखकर ही हम मौजूदा घटनाक्रम को समझ सकते हैं। वेनेजुएला पर हमला ब्रिक्स को कमजोर करने की अमरीकी रणनीति का हिस्सा है। हालाँकि अमरीका के मध्य एशिया में डॉलर के घटते वर्चस्व को पुनर्स्थापित करने के मंसूबों पर फिलहाल ईरान ने गम्भीर चुनौती पेश की है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया के 20 फीसदी तेल का परिवहन होता है, उसे प्रभावी रूप से बन्द कर अमरीकी व्यवस्था पर करारी चोट की है। इससे खाड़ी के अमरीकी सहयोगी देशों पर भारी दबाव पड़ा है और उनका पेट्रो–डॉलर में तेल निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। क्या यह पेट्रो–डॉलर व्यवस्था के पतन की शुरुआत है, यह भविष्य ही बतायेगा।
Leave a Comment
लेखक के अन्य लेख
- अन्तरराष्ट्रीय
-
- अफगानिस्तान से अमरीकी सैनिकों की वापसी के निहितार्थ 14 Mar, 2019
- अमरीका–ईरान युद्ध में पेट्रो–डॉलर की भूमिका 5 May, 2026
- राजनीति
-
- अग्निपथ योजना : नौजवानों की बर्बादी पर उद्योगपतियों को मालामाल करने की कवायद 20 Aug, 2022
- नागालैंड में मजदूरों का बेरहम कत्लेआम 13 Apr, 2022
- भाजपा सदस्यता अभियान की असलियत 1 Jan, 2025
- लोकतंत्र की हत्या के बीच तानाशाही सत्ता का उल्लास 23 Sep, 2020
- लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की रणनीति 13 Sep, 2024
- वैश्विक विरोध प्रदर्शनों का साल 8 Feb, 2020
- ‘बिग ब्रदर इज वाचिंग यू’– पिछले 50 सालों के आन्दोलनों का गृह मन्त्री ने माँगा ब्यौरा 12 Dec, 2025
- राजनीतिक अर्थशास्त्र
-
- आर्थिक संकट के भवर में फँसता भारत 14 Dec, 2018
- गहरे संकट में फँसी भारतीय अर्थव्यवस्था सुधार की कोई उम्मीद नहीं 20 Jun, 2021
- मोदी के शासनकाल में अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा 6 May, 2024
- मोदी सरकार की सरपरस्ती में कोयला कारोबार पर अडानी का कब्जा 17 Feb, 2023
- लक्ष्मी विलास बैंक की बर्बादी : बीमार बैंकिंग व्यवस्था की अगली कड़ी 14 Jan, 2021
- संकट की गिरफ्त में भारतीय अर्थव्यवस्था 15 Jul, 2019
- समाचार-विचार
- विचार-विमर्श
-
- कोरोना महामारी और जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था 20 Jun, 2021
- पर्यावरण
-
- कुडानकुलम नाभिकीय संयंत्र : मौत का कारखाना 15 Aug, 2018