घुसपैठियों के नाम पर मुस्लिम प्रवासियों का उत्पीड़न
हाल ही में सुनाली खातून और उनके परिवार का मामला एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया। पिछले साल दिल्ली पुलिस ने बांग्लादेशी घुसपैठिया होने का आरोप लगाकर उन्हें बांग्लादेशी बार्डर के पार धकेल दिया था। घुसपैठियों के खिलाफ सरकार की सख्त कार्रवाई बताकर गोदी मीडिया ने इसका जमकर प्रचार किया था जिससे यह मामला सुर्खियों में आ गया था। जब लोगों ने सुनाली खातून के बारे में जाँच–पड़ताल की तो हकीकत सामने आयी। इसके बाद सरकार और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने शुरू हो गये। कोई जवाब देने के बजाय दोनों उसे नजरअन्दाज कर रहे हैं। दरअसल, मामला यह था कि सरकार ने सुनाली खातून और उनके परिवार को गैर–कानूनी रूप से दिल्ली आकर बसने के जुर्म में देश से निकाल दिया था। एक साल बाद बांग्लादेश सरकार ने उन्हें भारतीय नागरिक बताकर वापस भारत भेज दिया।
पत्रकारों और मानवाधिकार संगठनों द्वारा शुरुआती जाँच–पड़ताल में जो बातें और तथ्य सामने आये हैं, वह चैकाने वाले हैं। पुलिस ने सुनाली के परिवार द्वारा दिये गये दस्तावेजों को नजरन्दाज करके, उनसे पैसे और फोन छीनकर रातों–रात बांग्लादेशी सीमा के पार छोड़ दिया। सुनाली उस वक्त गर्भवती थी। सुनाली की बहन रोशनी ने जब दिल्ली पुलिस से न्याय की गुहार लगायी तो पुलिस ने उनसे 30,000 रुपये ऐंठ लिये। 30 सितम्बर को बांग्लादेश की अदालत ने अपने फैसले में सुनाली के भारतीय नागरिक होने की पुष्टि की और ढाका में मौजूद भारतीय उच्चायोग से उनकी भारत वापसी की व्यवस्था करने को कहा। बांग्लादेश की अदालत में आरोप झूठे साबित हो जाने के बाद सुनाली के परिजनों को पश्चिम बंगाल के अपने पुश्तैनी गाँव लौटने में लगभग पूरा एक साल लग गया।
यह केवल एक सुनाली खातून का ही मामला नहीं है, बल्कि आमिर, महबूब शेख जैसे सैंकड़ों बांग्ला भाषी मुस्लिमों और उनके परिजनों की दास्तान है जिनके साथ अपने ही देश भारत में अमानुषिक व्यवहार हो रहा है। यह सभी लोग अपना घर और गाँव छोड़ दिल्ली, मुम्बई, गाँधीनगर जैसे महानगरों में मजदूरी के लिए आये थे लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि धर्म और भाषा को लेकर उन्हें निशाना बनाया जा सकता है। सभी के पास आधार कार्ड और राशन कार्ड मौजूद हैं। दशकों से वह वोट डालते आये हैं। इनमें से बहुतों के पास आजादी के पहले के जमीन के दस्तावेज तक मौजूद हैं। इसके बाद भी इन्हें घुसपैठिया बताया जा रहा है। पुलिस–प्रशासन और सरकार द्वारा घुसपैठियों के नाम पर की जा रही सारी कार्रवाईयों पर सवालों का उठना लाजमी है। साथ ही ये कारगुजारी साम्प्रदायिक राजनीति के पीछे के खेल को उजागर करती हैं। जाँच–पड़ताल करने पर दूसरे राज्यों में भी ऐसी घटनाएँ नजर आती हैं जो इस समस्या को गहराई से समझने की माँग करती है।
गृह मंत्रालय द्वारा गैरकानूनी अप्रवासियों से जुड़े राज्य सरकारों को दिये गये आदेशों के बाद, इस प्रकार की घटनाएँ बढ़ी हैं। बांग्लादेशी बॉर्डर गार्ड्स के अनुसार 1 जून, 2026 के बाद से 21 बार बीएसएफ ने 200 से अधिक लोगों को बांग्लादेश के सीमावर्ती जिलों में धकेलने की कोशिशें की हैं। यह भी बताया जा रहा है कि 7 मई से 15 जून 2025 के बीच भारत ने 1,500 से ज्यादा मुस्लिम पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को बांग्लादेश भेजा, जिनमें म्याम्मार के लगभग 100 रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थी भी शामिल थे।
पिछले कुछ सालों में असम, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तर प्रदेश सहित कई भाजपा शासित राज्यों में अपने ही देश के बंगाली मुसलमानों के खिलाफ पुलिस द्वारा उत्पीड़न और हिंसा की घटनाएँ बढ़ीं हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार आयी। चुनाव के दौरान भाजपा ने शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार को किनारे कर साम्प्रदायिकता को हवा दी। घुसपैठियों को बाहर निकालना भाजपा का प्रमुख नारा बना था।
चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री बने सुवेन्दु अधिकारी ने सार्वजनिक चेतावनी जारी की–– “जल्दी भाग जाओ, वरना सरकार वो करेगी जो जरूरी है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को कोर्ट भेजने की कोई जरूरत नहीं है। कानून में ऐसा प्रावधान है जिसके तहत पुलिस उन्हें सीधे बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) को सौंप सकती है और बीएसएफ यह पता लगाएगी कि जिसे सौंपा गया है वह बांग्लादेशी है या नहीं––– हम उन्हें तीन महीने, छह महीने या दो साल तक जेल में क्यों रखें और उन्हें आपके चावल, दाल, तेल, मछली, अण्डे और दवाइयाँ क्यों दें? क्या वे हमारे दामाद हैं?” मुख्यमंत्री का यह भी दावा है कि “डिटेक्ट, डीलीट और डीपोर्ट” यानि पता लगाओ, हटाओ और निकालो की नीति के तहत सैकड़ों लोगों को घुसपैठिया बताकर हिरासत में ले लिया गया। इसके साथ ही लगभग 5,000 लोगों को रखने के लिए पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में ‘होल्डिंग सेण्टर’ भी बनाये गये हैं।
इसी साल असम में भी चुनाव हुए। यहाँ भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रही। दूसरी बार हेमन्त बिसवा सरमा मुख्यमंत्री बने। सरमा ने अपने पूर्व–कार्यकाल की तरह इस बार भी घुसपैठियों को असम के बाहर खदेड़े जाने की बात की। राज्य के आँकड़ों के मुताबिक, सिर्फ जून, 2025 के महीने में ही असम में बेदखली के पाँच अभियानों में बंगाली मुसलमानों के लगभग 3,400 घरों को बुलडोजर से गिरा दिया गया। 2021 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से, सरमा ने 160 वर्ग किलोमीटर जमीन से 50,000 लोगों को बेदखल किया, जिनमें ज्यादातर बंगाली मुसलमान हैं।
राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए लोगों को बांग्लादेशी बार्डर पर छोड़ा गया। इसके बारे में बांग्लादेश की सरकार ने भारत सरकार को चेताया। उसने भारत सरकार को यह भी कहा कि अगर किसी व्यक्ति की पहचान बांग्लादेशी नागरिक के तौर पर हो भी जाये तो भी भारत सरकार उसे बॉर्डर पार धकेलने के बजाय कानूनी और राजनयिक तरीकों से वापस भेजे। इसके साथ बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने असम के मुख्यमंत्री हिमन्त बिस्वा सरमा और सुवेन्दु अधिकारी की बांग्लादेश के बारे में अपमानजनक भाषा और टिप्पणियों पर कड़ा विरोध जताते हुए ढाका में भारत के राजदूत को तलब किया।
बांग्लादेश का यह गुस्सा यूँ ही अचानक नहीं फूटा। इसके पीछे भारत के शीर्ष पदों पर विराजमान नेताओं द्वारा खुलेआम बंगाली भाषा, मुस्लिम समुदाय और बांग्लादेश के खिलाफ नफरती बयान और भाषणबाजी मुख्य कारण है। गृहमंत्री अमित शाह ने असम में खुले मंच से बांग्लादेशी प्रवासियों के लिए “दीमक”, “घुसपैठिये” जैसे शब्दों का प्रयोग करने से कभी गुरेज नहीं किया। मोदी भी इस बार बंगाल के चुनाव–प्रचार में जनसभा को सम्बोधित करते हुए घुसपैठिये शब्द का इस्तेमाल करने से नहीं चूके। वह अन्य राजनीतिक पार्टियों पर अधिक वोट पाने के लिए घुसपैठियों को यहाँ बसाने और बंगाल की डेमोग्राफी से छेड़छाड़ करने का झूठा आरोप लगाते हैं।
हम सभी जानते हैं कि भाजपा–आरएसएस हमेशा से ही अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और जनता को बाँटने का काम करते आये हैं। सीएए–एनआरसी नागरिकता संशोधन अधिनियम के चलते मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यक गरीब एवं पिछड़े प्रवासियों को बड़ी मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं। भारत में चलायी जा रही आम जनगणना और एसआईआर 2–0 की प्रक्रिया ने भी उनकी नयी आशंकाओं को जन्म दिया है। बंगाल में ही एसआईआर के बाद लगभग 91 लाख नाम हटाये गये। 2019 में असम राज्य में 19 लाख लोगों की नागरिकता खत्म कर दी गयी थी। वहाँ आज खुलेआम सरकार बंगाली भाषी निवासियों को डिटेंशन सेण्टर में रखने और बॉर्डर पार धकेलने की बात स्वीकार रही है।
यह साफ हो गया है कि 2019 में देशव्यापी सीएए–एनआरसी लागू करने के पीछे सरकार की मंशा जनता में फूट डालने और चुनावी फायदा बटोरने की ही थी। असम में एक करोड़़ घुसपैठिये होने का जो दावा किया गया था, वह आगे बेबुनियाद साबित हुआ। नागरिकता नहीं साबित कर पाने वालों में लगभग दो–तिहाई हिन्दू निकले जो सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गया। एनआरसी के बाद सरकार नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 लायी, जिसके मुताबिक अफगानिस्तान, पकिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई धर्म के लोग भारत में नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते थे लेकिन मुसलमान नहीं। यह भी विचित्र बात मालूम होती है कि गरीब बंगाली मुसलमानों को घुसपैठी करार देने वाली सरकार 2024 से बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को दिल्ली में पनाह दिये हुए है, जिन्हें बढ़ते जन–विरोध के चलते बांग्लादेश से भागकर भारत आना पड़ा था।
आज भारत में तमाम राजनेता और सबसे ज्यादा भाजपा के नेता सत्ता का सुख भोगने के लिए धर्म और जाति के नाम पर सामाजिक तानेबाने को तार–तार करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे हैं। मीडिया का काम केवल झूठ फैलाना और सत्ता पक्ष का प्रचार करना रह गया है। भारत के संघीय ढाँचे को तोड़ने और गंगा–जमुनी संस्कृति को विषैला करने के प्रयासों का ही परिणाम आज सुलगते मणिपुर के रूप में हमारे सामने है। अंग्रेजों की तरह मोदी सरकार आज ‘बाँटों और राज करो’ की नीति को बढ़चढ़ कर लागू कर रही है। उनका मकसद जनता में फूट डालकर उसे दरिद्रता और अज्ञानता के जाल में फँसाये रखना है। इतिहास गवाह है कि लूटेरों और धर्म के ठेकेदारों का सामना जनता ने हमेशा जात–पात, नस्ल–धर्म आदि फर्जी बनाये बटवारों को दूर करके किया है। अभी असम में आयी भीषण बाढ़ के दौरान विभिन्न समुदायों द्वारा एक–दूसरे की मदद करने के जो दृश्य सामने आये, उसमें लोगों ने तमाम बटवारों को दरकिनार कर एक–दूसरे की मदद की। जनता नफरती राजनीति नहीं, भाईचारा और शान्ति चाहती है। बाढ़ के वक्त हिन्दुओ और मुसलमानों ने अपने घर में एक–दूसरे को पनाह दी और आपसी भाईचारे की नयी मिसाल पेश की।
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