बच्चों के हत्यारे इजराइली दरिन्दे
इजराइल ने गाजा के नासिर अस्पताल के पास खान यूनिस शिविर पर हमला किया। इसके बाद लगी आग में एक ही परिवार के सात लोगों की मौत हो गयी। इनमें पिता, तीन बच्चे और उनके पोते–पोतियाँ शामिल थे। प्रत्यक्षदर्शी अतल्लाह अबू हदैयेद ने बताया, “धमाका इतना तेज था कि हम दौड़कर घटनास्थल पर पहुँचे। वहाँ देखा कि मेरे चचेरे भाई इधर–उधर पड़े थे और चारों ओर आग लगी हुई थी। लोग अपने परिजनों को मलबे में खोज रहे थे।” हालात ये हैं कि गाजा में लगभग सात करोड़ टन मलबे के नीचे हजारों लोग दफ्न हैं। पिछले कई वर्षों से गाजा में जारी नरसंहार की हृदयविदारक खबरें दुनियाभर में घूम रही हैं और संवेदनशील लोग इससे व्यथित हैं।
फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि युद्धविराम की घोषणा के बाद गाजा में इजराइली हमलों में 981 फिलिस्तीनियों की मौत हुई है। संयुक्त राष्ट्र ने 574 फिलिस्तीनियों की मौत की पुष्टि की है, जिनमें 183 बच्चे शामिल हैं। इनमें पाँच बच्चे ऐसे थे, जिनकी उम्र एक वर्ष से कम थी।
अन्तरराष्ट्रीय जाँच आयोग की एक रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इजराइल ने जानबूझकर फिलिस्तीनी बच्चों को निशाना बनाया और उनकी निर्ममता से हत्या की। अक्टूबर 2023 से अक्टूबर 2025 तक 20,000 से ज्यादा बच्चों की हत्या की गयी और 44,143 बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया गया। यह संख्या समुद्र में तैरते हिमखण्ड की तरह है, जिसका बहुत बड़ा हिस्सा नजरों से छिपा हुआ है और मलबे के नीचे दबा है। गाजा में लगभग 12 लाख बच्चों में से 65 हजार बच्चे या तो काल के गाल में समा गये हैं या जिन्दगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। इनमें से ज्यादातर 5 साल से कम उम्र के बच्चे हैं और 10,029 बच्चों की उम्र तो एक साल से भी कम है।
जून 2026 में इजराइली सुरक्षा बलों ने एक सैन्य चैकी के पास एक कार पर गोलीबारी की। कार में 7 महीने का सैम अपनी माँ की गोद में था। गोली सैम के सिर में लगी और उसकी मौके पर ही मौत हो गयी। उस मासूम बच्चे का क्या कसूर था, जो अभी ठीक से बोल भी नहीं सकता था? सैम उन 241 बच्चों में शामिल है, जिन्हे भुलाया नहीं जा सकता।
कई डॉक्टरों और मानवाधिकार संगठनों ने दावा किया है कि बहुत से बच्चों के सिर और सीने में गोली मारकर उनकी हत्या की गयी। ये जानबूझकर की गयी हत्याएँ हैं। हजारों बच्चे अनाथ और विकलांग हो गये हैं। युद्धविराम के बाद भी बच्चों को लगातार निशाना बनाया गया और उनके साथ यौन हिंसा और प्रताड़ना जैसी घिनौनी हरकतें की गयीं।
इजराइली सेना के हाथ बच्चों के खून से सने हैं। स्कूलों और अस्पतालों को गोला–बारूद से तबाह कर दिया गया। गाजा के ज्यादातर इलाकों में खाना, साफ पानी और दवाइयों की इतनी कमी है कि बच्चों में कुपोषण और गम्भीर बीमारियाँ तेजी से फैल रही हैं। गाजा में भुखमरी का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ा है। भोजन की भारी कमी के कारण लोगों को राहत केन्द्रों पर घण्टों, कभी–कभी दिनों तक, कतार में खड़ा रहना पड़ रहा है। यह नजारा इनसानियत में विश्वास रखने वाले किसी भी व्यक्ति को भीतर तक झकझोर देने वाला है। हालात इतने भयावह हैं कि बच्चे भूख मिटाने के लिए जूठन और कतरन तक खाने को मजबूर हैं। दो वर्ष से कम उम्र के लगभग 90 फीसदी बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है। इसका उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर भी गहरा असर पड़ रहा है।
आज फिलिस्तीन की जनता अपनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। यह संघर्ष बताता है कि फिलिस्तीन की धरती पर चाहे लाखों टन बम बरसा दिये जायें, फिर भी वहाँ के लोग अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे। आज पूँजीवादी–साम्राज्यवादी व्यवस्था पूरी तरह इनसानियत की दुश्मन बनी हुई है। इसी का नतीजा है कि फिलिस्तीनी जनता मौत के साये में जीने को मजबूर है।
फिलीस्तीन में हजारों मासूम बच्चों की चीखें गूँज रही हैं। उनके ख्वाब मलबे में बिखर रहे हैं। लाखों घर मलबे में तब्दील हो चुके हैं और उनके नीचे अनगिनत जिन्दगियाँ दबी हैं। युद्ध के बीच जन्मे बच्चों से उनकी जिन्दगी और उनका बचपन छीना जा रहा है। दर्द को झेलने वाली नस्लें शायद इसे कभी भूल नहीं पाएँगी। कत्लोगारत के शहंशाह स्पेस टूरिज्म की बातें बघार रहे हैं और मासूम बच्चों के सिर में गोलियाँ मार रहे हैं। आखिर उन बच्चों का क्या कसूर है, जो इस मानवद्रोही युद्ध के हवनकुण्ड मे स्वाहा किये जा रहे हैं? इसका जवाब है किसी के पास?
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