मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

इन्दौर का पानी बना मौत

जनवरी महीने में देश के सबसे साफ शहर कहे जाने वाले इन्दौर से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आयी। कान्ह नदी के किनारे बसे घनी आबादी वाले भागीरथपुरा इलाके में सरकारी नल से आने वाला दूषित पानी पीने से 25 लोगों की मौत हो गयी और लगभग 3000 लोग उल्टी, दस्त (डायरिया) और डिहाइड्रेशन जैसी बीमारियों की चपेट में आ गये।

पानी के नमूनों की जाँच में पाया गया कि इसमें हैजा फैलाने वाले विब्रियो कॉलरा, मानव मलजनित फीकल कॉलिफॉर्म और ई– कोलाई जैसे खतरनाक जीवाणु मौजूद थे। इसके अलावा, इलाके के 51 ट्यूबवेल का पानी भी ई– कोलाई से दूषित पाया गया।  स्थानीय लोगों ने एक महीने पहले ही पानी में बदबू की शिकायत की थी, लेकिन प्रशासन ने इसे नजरअन्दाज किया। 25 मौतों के बाद जब लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया, तो जैसा की दस्तूर बन गया है, कुछ अधिकारियों को आनन–फानन में निलम्बित किया गया और मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की घोषणा कर दी गयी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि पानी इतना दूषित कैसे हो गया?

इसका मुख्य कारण जर्जर पाइपों से रिसता सीवर का गन्दा पानी, सीधे पेयजल में मिल जाना है। यहाँ सीवर और पानी की पाइपलाइनें मानकों के अनुसार नहीं बिछायी गयी हैं। इन पाइपलाइनों का एक–दूसरे के बेहद करीब या कई जगहों पर एक–दूसरे के ऊपर–नीचे पाया जाना आम बात है। यह समस्या केवल इन्दौर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के तमाम शहरों में यही स्थिति है। सालों पुरानी जंग लगी पाइपलाइनें सीवर नालों के साथ बिछी दिख जाती हैं। स्थिति की गम्भीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि कई विभागों के पास इन पाइपलाइनों का सटीक नक्शा तक उपलब्ध नहीं है। जानकारी के अभाव में कई बार इन्हीं पाइपलाइनों के ऊपर शौचालय या अन्य निर्माण कर दिये जाते हैं। आम लोग दूषित पानी से होने वाली बीमारियों और मौत के शिकार होते हैं।

कई शहरों में नल का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि त्वचा के सम्पर्क में आते ही खुजली होने लगती है, जिससे इसका उपयोग नहाने या कपड़े धोने के लिए भी नहीं किया जा सकता।

यह संकट केवल पाइपलाइनों तक सीमित नहीं है। शहरों के पास बहने वाली नदियाँ अब गन्दे नालों में तब्दील हो चुकी हैं। कभी जीवनदायी रही नदियाँ, आज जीवन लीला समाप्त कर रही हैं। औद्योगिक कचरे से निकलने वाले जहरीले रसायनों और भारी धातुओं को बिना किसी रोक–टोक के नदियों में छोड़ा जा रहा है। सीवेज ट्रीटमेण्ट प्लाण्टों और नालों से बहता मल जो हानिकारक जीवाणुओं का घर है, सीधे नदियों में बहा दिया जाता है। दशकों से जारी इस प्रदूषण ने भूजल को जहरीला बना दिया है।

आज हालात ऐसे हैं कि लोग इसे शुद्ध समझकर पीते हैं जो उनकी नसों में जहर घोल रहा है। जल संसाधन मंत्रालय की “समग्र जल प्रबन्धन सूचकांक” रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 2 लाख लोगों की मृत्यु दूषित पेयजल से होती है। कहने की जरूरत नहीं कि ये सब आम गरीब लोग ही हैं। राष्ट्रीय आँकड़ों के अनुसार, 2005 से 2022 के बीच पानी से होने वाली बीमारियों के 20–98 करोड़ से अधिक मामले दर्ज किये गये। इनमें डायरिया, हैजा, टाइफाइड और वायरल हेपेटाइटिस शामिल हैं। इनमें से लगभग 86 प्रतिशत मामले डायरिया के हैं, जो पानी से होने वाली सबसे आम बीमारी है। आज 21वीं सदी में यह कोई स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि आम लोगों पर डाली जा रही सरकारी आफत है।

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने जल जीवन मिशन, नमामि गंगे और अटल भूजल योजना जैसी परियोजनाओं पर 9 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किया है। साफ पानी के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन लोगों के घरों में साफ पानी नहीं पहुँचा।

आज भी देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ 4 से 6 घण्टे का सफर करके दूर–दराज से पानी ढोकर लाने को मजबूर हैं। लगभग 4 करोड़ घर ऐसे हैं, जहाँ अब भी नल का पानी उपलब्ध नहीं है। जलाशयों में जमा गाद के कारण उनकी जलधारण क्षमता कम होती जा रही है। जलाशयों के आसपास बढ़ते औद्योगिकीकरण, रिसॉर्ट निर्माण और अवैध खनन के कारण वर्षा का पानी भी इनमें पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुँच पाता।

“ज्यों–ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया” सरकारी योजनाओं की स्थिति कुछ ऐसी ही है। नमामि गंगे योजना में 30 हजार करोड़ रुपये खर्च किये गय,े लेकिन गंगा माँ की तबियत आज भी नासाज है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के किनारे बने सीवेज ट्रीटमेंट प्लाण्ट या तो काम नही करते या फिर उनकी ट्रीटमेंट की क्षमता इतनी कम है कि सारा कचरा सी/ो गंगा में बह रहा है।

जब सरकार साफ पानी उपलब्ध कराने में नाकाम हो गयी, तब आये–– पानी के व्यापारी। उन्होंने भारत में बोतलबन्द पानी बेचा जिसका बाजार 80 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा तक पहुँचा चुका है। आरओ फिल्टर का बाजार करीब 25 हजार करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। जनता की जेब पर डाका जारी है। ये कारोबारी लूट से तब तक फलते–फूलते रहेंगे जब–तक देश के पीने के पानी में जहर घुलता रहेगा और लोंगों की जान जाती रहेगी।

Leave a Comment