देश में बढ़ती असमानता का राजनीतिक अर्थशास्त्र
विश्व असमानता रिपोर्ट (डब्लूआईएल) में इस साल भी यही उजागर हुआ है कि भारत में अमीरी–गरीबी की खाई और ज्यादा बढ़ गयी है। यह पिछले 23 सालों से सुरसा के मुँह की तरह लगातार बढ़ती जा रही है। 23 मार्च 2024 को फ्रण्टलाइन में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के एक प्रतिशत सबसे अमीर लोग देश की कुल आय का 22–6 प्रतिशत हड़प जाते हैं। इन एक प्रतिशत लोगों का देश की 40–1 प्रतिशत सम्पत्ति पर कब्जा है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश के सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों की सम्पत्ति में 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसके उलट देश के 50 प्रतिशत मेहनतकश लोग आर्थिक रूप से कंगाल हो गये। राष्ट्रीय आय में उनकी हिस्सेदारी घटकर मात्र 15 प्रतिशत रह गयी है। लगातार घट रही आय के चलते ये लगभग सम्पत्तिविहीन हो चुके हैं।
1991 में भारत में सिर्फ एक ही अरबपति था, जिसकी सम्पत्ति 100 करोड़ अमरीकी डॉलर से ज्यादा थी, लेकिन 2022 तक ऐसे अरबपतियों की संख्या बढ़कर 162 पहुँच गयी। ऑक्सफेम की एक रिपोर्ट बताती है कि किसी ग्रामीण मजदूर को एक बड़ी कम्पनी के सबसे बड़े अधिकारी की सालभर की कमाई के बराबर रकम पाने के लिए 21 बार जन्म लेना पड़ेगा।
अमीरी–गरीबी की खाई आज जितनी गहरी है उतनी अंग्रेजों की गुलामी के दौर में भी नहीं थी। गरीबी के मामले में अधिकतर भारतीयों के लिए आज का दौर अंग्रेजों की गुलामी के दौर से भी खराब है। यह साफ दिखता है, आज देश की 80 फीसदी मेहनतकश जनता अपनी मूलभूत जरूरतों (रोटी, कपड़ा, मकान) से भी वंचित है जबकी अम्बानी अपने बेटे की शादी में 5 हजार करोड़ रुपये पानी की तरह बहा देता है।
सम्पत्ति पैदा करने का एकमात्र स्रोत है उत्पादन यानी इनसान की जरूरत के नये–नये समान और भोजन आदि पैदा करना, जो केवल मजदूर और किसान करते हैं। क्या पूँजीपति, कारोबारी, अधिकारी, ठेकेदार, राजनेता, अभिनेता जैसे शासक वर्ग के लोग कोई उत्पादन नहीं करते हैं, ये तो केवल उत्पादन और उसके वितरण का नियोजन तथा नियमन करते हैं। क्या डॉक्टर, मास्टर, क्लर्क, पुलिसमैन जैसे सेवा क्षेत्र के लोग कोई उत्पादन करते हैं ? नहीं, ये सब तो केवल उत्पादकों को अपनी सेवा बेचते हैं। यानी दुनिया में नयी सम्पत्ति केवल मजदूर और किसान ही पैदा करते हैं। ये दोनों जो सम्पत्ति पैदा करते हैं उसे किसी न किसी तरह हड़पकर ही कोई सम्पत्तिशाली बन सकता है। मेहनतकशों की सम्पत्ति की बेतहाशा लूट ही आज अमीर–गरीब के बीच की गहरी खाई का कारण है। सीधी सी बात है कि जिसे बुरी तरह लूटा जा रहा है वह कंगाल होता जा रहा है और लूटनेवाला अमीर बनता जा रहा है। अगर आज अमीर–गरीब के बीच की खाई अंग्रेजी राज से भी ज्यादा गहरी है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि अंग्रेजी राज में मेहनतकशों को जितना लूटा जाता था उससे कहीं ज्यादा आजाद भारत में लूटा जाता है।
मुट्ठीभर लोगों द्वारा विशाल मेहनतकश जनता की लूट के जरिये गैरबराबरी पैदा करने वाली मौजूदा व्यवस्था को जायज ठहराने के लिए शासक वर्ग कई तरह के भ्रम फैलाते हैं, जैसे सभी बराबर होंगे तो कोई काम नहीं करेगा, यानी देश की तरक्की के लिए कुछ लोगों का गरीब होना जरूरी है और इस नैतिक जिम्मेदारी को निभाने का सौभाग्य किसे मिलता है, जाहिर है, उन मेहनतकशों को जिनकी सम्पत्ति अमीरों द्वारा लूट ली जाती है।
1990 के बाद उदारीकरण की नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की सम्पत्ति को भी लूट लेने का माडल अपनाया गया। निजिकरण के जरिये सरकारों ने सार्वजानिक उपक्रमों को कौड़ी के भाव पूँजीपतियों को देने का काम किया। साथ ही विशेष आर्थिक क्षेत्र, नये श्रम कानून, भूमि अधिग्रहण कानून आदि के जरिये उन्हें जनता को और ज्यादा लूटने छूट दी गयी।
जूठन पूँजीवाद (ट्रिकल डाउन) के सिद्धान्त के जरिये बताया गया कि अमीरों को और अमीर बनाने से जनता की जिन्दगी बेहतर होगी। अमीर खा–अघाकर जो जूठन छोड़ देंगे उससे ही जनता का भला होगा। इस नये मॉडल में पूँजीपति और सरकार के बीच के बहुत सारे भेद मिट गये। 4 जून 2005 को टाटा ने छत्तीसगढ़ में स्टील प्लाण्ट लगाने के लिए सरकार से करार किया। इसके खिलाफ आदिवासियों के चल रहे आन्दोलन का ‘सलवा जुडूम’ ने बर्बर दमन किया। यह पूँजीपतियों और सरकार के गठजोड़ से खड़ी की गयी एक निजी मिलिशिया थी। इसने आदिवासियों का कत्लेआम इसलिए किया क्योंकि वे लुटने–पिटने की अपनी नैतिक जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे थे। सरकारों ने सारे नियम ताक पर रखकर बड़े व्यवसायों को नाजुक पर्यावरण वाले इलाकों से संसाधनों को लूटने की इजाजत दी, ताकि उन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को उजाड़कर तथाकथित विकास को आगे बढ़ाया जा सके।
सरकारों ने जब भी सामाजिक न्याय की बात की तो पूँजीपतियों को बिना किसी कानूनी रोकटोक के जनता की सम्पत्ति लूटने की छूट दी गयी। मान लिया गया कि जब उनकी दौलत का ढेर बहुत बड़ा हो जायेगा तो उससे समृद्धि कुछ जूठन नीचे गिरकर जनता का जीवन भी बेहतर बना देगी। विकास के नये मॉडल में सबकी नैतिकता तय थी, पूँजीपति की नैतिकता जनता को जी भर लूटना, सरकार की नैतिकता पूँजीपतियों के रास्ते में आने वाली हर बाधा को दूर करना और जनता की नैतिकता चुपचाप सब बर्दाश्त करना। लेकिन जनता अपनी नैतिकता से पीछे हटने लगी। नतीजतन सरकार और पूँजीपतियों को अपनी नैतिकता निभाने में भी दिक्कत होने लगी।
इस समस्या के समाधान के लिए 2014 में मोदी को सत्ता की बागडोर सौंपी गयी। इस सरकार में अमीरी–गरीबी के बीच की खाई और तेजी बढ़ी है। इसने कुछ नये तरीके अपनाये हैं जैसे, पूँजीपति वर्ग और पूरी राजसत्ता के बीच के फर्क को न्यूनतम स्तर पर ले जाना, इसकी परदेदारी के लिए नये–नये दुश्मन गढ़ना, जनता लुटने की अपनी नैतिक जिम्मेदारी बखूबी निभाये, इसके लिए उसे धर्मान्ध बनाना और जो इस नैतिकता से पीछे हटे उस पर राजसत्ता की पूरी ताकत से प्रहार करना। यह मोदी सरकार को बाकियों से अलग करता है।
इसने अपने मॉडल को गुजरात मॉडल के नाम से खूब प्रचारित किया। 2002 में मुसलमानों के नरसंहार के बाद गुजरात में पूँजी निवेश न करने की निवेशकों की धमकियों के सामने नतमस्तक होते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “वाइब्रेण्ट गुजरात” समारोह शुरू किया। इसमें पूरे प्रदेश को पूँजीपतियों के लिए उसी तरह खुला छोड़ दिया गया जैसे साण्डों के लिए लहलहाते खेत। इसी आयोजन में गौतम अडानी ने बड़े निवेश के वादे किये।
2008 में किसानों के भारी विरोध के चलते टाटा को पश्चिम बंगाल से अपनी नैनो कार बनाने की परियोजना वापस लेनी पड़ी। इसके बाद मोदी ने टाटा को तीन शब्दों का एक सन्देश भेजा “वेलकम टू गुजरात”। बदले में टाटा ने दुनिया भर में मोदी का खूब गुणगान किया और कहा कि गुजरात में अब तक ज्यादा पूँजी निवेश न करके उसने मूर्खता की थी। अनिल अम्बानी ने मोदी को लोगों का भगवान, नेताओं में नेता और राजाओं में राजा बताया।
गुजरात के इस विकास मॉडल में सिर्फ पूँजीपतियो द्वारा राज्य के संसाधनों और मजदूरों की मेहनत को लूटना था। पूँजीपतियो को लगभग मुफ्त में जमीन, शून्य ब्याज दरों पर बड़े कर्ज, कर में भारी छूट और बिना किसी झंझट के पर्यावरण मंजूरी दे दी गयी और यह सब जनता पर कर का भारी बोझ डालकर किया गया। इस डाकेजनी से लोगों का ध्यान हटाने के लिए मुस्लिमों के रूप में नये दुश्मन गढ़े गये, लोगों को अक्ल से अन्धा करने के लिए हिन्दुत्ववाद की लहर चलायी गयी, अगर किसी ने विरोध किया तो उस पर सारी शासन–सत्ता का जबरदस्त कहर टूटा। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने उस समय रिपोर्ट किया था कि रिलायंस इण्डस्ट्रीज, एस्सार स्टील और अडानी पावर जैसी बड़ी कॉर्पाेरेट संस्थाएँ सरकार की उदारता के प्रमुख लाभार्थी रही।
उदारीकरण के गुजरात मॉडल में पूँजीपति वर्ग को बेहिसाब मदद दी गयी। इस तर्क को बार–बार दुहराया गया कि अमीरों की समृद्धि ही समाज के बाकी हिस्सों को बेहतर बनाने के लिए नीचे की ओर बहेगी। इसलिए असमानता से डरने के बजाय देश के विकास के लिए इसे बढ़ाना जरूरी है। शासकों के लिए इसके सकारात्मक परिणाम आये हैं। भारत में असमानता तेजी से बढ़ी है, यहाँ अमरीका और चीन के बाद दुनिया के सबसे ज्यादा अरबपति हैं, दूसरी तरफ यहाँ दुनिया के सबसे ज्यादा कंगाल बसते हैं।
लेकिन शासकों के माथे पर चिन्ता की कुछ बहुत गहरी लकीरें भी दिख रही हैं। भारत दुनिया में सबसे बड़ी हड़तालों और आन्दोलनों का देश भी बन गया है। मेहनतकश जनता उसके ऊपर थोपी गयी नैतिकता को अस्वीकार करने लगी है। पहले किसानों ने मोदी से घुटने टिकवाये फिर ट्रक–ड्राइवरों ने। खौफजदा मोदी नयी श्रम–संहिताओं को लागू करने की अभी तक हिम्मत नहीं जुटा पाया है।
जनता सामन्तों और पादरियों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करे, जनता पर यह नैतिकता सबसे ज्यादा कठोरता से यूरोप में थोपी गयी थी। दुनिया के उसी हिस्से में सबसे पहले जनता ने सामन्ती शासकों को इतिहास के पन्नों की स्याही में तब्दील किया। मोदी समेत भारत के तमाम शासक वर्ग को आज इसी परिणाम का डर सता रहा है। इन्तजार बस यह है कि जनता अपने ऊपर थोपी गयी नैतिकता को त्याग कर कब अपनी सच्ची नैतिकता धारण करे।
–– अरुण मौर्या
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