अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

अर्ली कैरियर के नाम पर बंधुआ मजदूरी योजना

बहुत दिनों से है ये मश्गला सियासत का

कि जब जवान हों बच्चे तो कत्ल हो जायें

–– साहिर लुधियानवी

12वीं कक्षा के बाद छात्र क्या कोर्स चुनें? बेरोजगारी के भयावह दौर में यह एक गम्भीर प्रश्न है। रिश्तेदार, अड़ोसी–पड़ोसी सब अलग–अलग राय देते है। “फलाँ के लड़के ने बी टेक किया था आज अच्छी सेलरी पा रहा है” या “फलाँ के भतीजे ने बीसीए किया था आज सेटल है” जैसे ब्रह्मवाक्य आपने भी सुने होंगे। जब हम चारों ओर समस्याओं से घिरे हों और ऐसे में कोई देवपुरुष समस्याओं का समाधान बताये तो हम सोचेंगे ही कि ‘तुमसे अच्छा कौन है?’ ऐसा ही एक समाधान मल्टीनेशनल कम्पनियों ने ‘अर्ली कैरियर’ प्रोग्राम के नाम पर दिया है।

‘अर्ली कैरियर’ प्रोग्राम ऐसी रोजगार और शिक्षा व्यवस्था है जिसके तहत छात्रों को पारम्परिक कॉलेज की पढ़ाई की जगह, 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करते ही सीधे आईटी या टेक सेक्टर में उतार दिया जाता है। एचसीएल, विप्रो, टीसीएस जैसी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ 12वीं कक्षा के बाद विज्ञान वर्ग के छात्रों के लिए अगल–अगल नाम से कार्यक्रम जारी करती हैं। भारत में एचसीएल का ‘टेक–बी’ और विप्रो का ‘डब्ल्यूआईएलपी’ जैसे प्रोग्राम इसके खास उदाहरण हैं। इसमें छात्रों को पहले 6 से 9 महीनों की तकनीकी ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद 6 महीने की ऑन–द–जॉब ट्रेनिंग दी जाती है। ऑन–द–जॉब ट्रेनिंग का समय 9 घण्टे प्रति दिन होता है। इस दौरान कम्पनी 10,000 रुपये का स्टाइपेण्ड देती है। ट्रेनिंग के लिए लोन भी देती है। ट्रेनिंग पूरी होते ही लोन को ब्याज समेत चुकाना पड़ता है। ट्रेनिंग के बाद छात्र फुल–टाइम कर्मचारी बन जाते है। इसमे कम्पनी डिजिटल प्रोसेस सपोर्ट और आईटी सर्विसेज के लिए अधिकतम वेतन 18 से 21 हजार प्रति माह देती है।

सुनने में ये बातें काफी लुभावनी लगती हैं, लेकिन असली समस्या बहुत गम्भीर है। ट्रेनिंग शुरू होते ही कम्पनी द्वारा 2–3 साल के सर्विस बॉण्ड पर हस्ताक्षर कराये जाते हैं। यानी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद आपको तय समय सीमा तक कम्पनी में काम करना अनिवार्य होगा। अगर कोई छात्र ट्रेनिंग के बीच में पढ़ाई या काम के दबाव की वजह से उसे छोड़ना चाहे, तो उससे भारी–भरकम जुर्माना वसूला जाता है। यह है बँधुआ मजदूरी। महँगे कोर्स करवाना अधिकतर माँ–बाप की हैसियत से बाहर की बात है। इसके बाद भी रोजगार की कोई गारण्टी नहीं। शिक्षा पर लाखों रुपये खर्च करने के बाद 5–10 हजार रुपये से अधिक वेतन वाली जॉब मिलना मुश्किल है। भ्रामक विज्ञापनों और झूठे दावों के जरिये बड़ी–बड़ी कम्पनियाँ छात्रों और अविभावकों को ऐसे प्रोग्राम लेने के लिए राजी करते है। इनमे शामिल होने के बाद पता चलता है कि ऐसी योजनाएँ समस्या का समाधान नहीं बल्कि खुद एक समस्या हैं। नॉएडा, बंगलुरु, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में खाने और रहने का खर्च बेहद ज्यादा है। इससे अलहदा पढ़ाई का लाखों रुपये का खर्च मुँह बाये खड़ा रहता है। कुल मिलकर सालाना 4 से 5 लाख का खर्च न चुका पाने के चलते छात्र और उसका परिवार बैंकों के कर्जदार बन जाते हैं।

आज कम्पनी को लाखों रुपये देकर नौजवान ट्रेंनिग लेते हंै। उनसे कुछ मिलना तो दूर की कौड़ी है। ट्रेनिंग के बाद इण्टर्नशिप के नाम पर वे कई साल तक नाममात्र के वेतन पर काम करते हैं। ऐसे कर्मचारियों से अक्सर 10–12 घण्टों तक काम लिया जाता है। 4–5 साल बाद अगर वेतन में कुछ बढ़ोतरी हो भी जाये तो भी वह रहने–खाने और बैकों की किस्त चुकाने के लिए कम पड़ता है।

जो छात्र 12वीं कक्षा की पढाई करके 17–19 वर्ष की उम्र में अर्ली कैरियर प्रोग्राम में जाते हैं, उनकी जवानी कम्पनी की बेगारी करने और बैंकों के कर्ज चुकाने में बीत जाती है। जो बैंक सुभाष चन्द्रा जैसे कारोबारी का 22000 करोड़ रुपये का कर्ज 6–़5 करोड़ रुपये में निपटा देते हैं वे ही छात्रों से एजुकेशन लोन की पाई–पाई वसूलते हैं। अगर छात्र इसे चुकाने में असमर्थ है तो खुदकुशी करके इस कर्ज की भरपाई करनी पड़ती है।

18–23 साल की ऊर्जावान उम्र को कम्पनी सोख लेती है। बदले में थका देने वाली गुलामी देती है। उसे हमेश डर रहता है कि कल अगर कम्पनी छँटनी का बहाना बनाकर उसे निकाल दे तो वह क्या करेगा? अर्ली कैरियर प्रोग्राम उसकी जवानी के सपनों को दफ्न कर देता है। यह सब अंग्रेजों की गुलामी की याद दिलाता है। अर्ली कैरियर योजना के दौरान हासिल की जाने वाली शिक्षा इसका जिवन्त उदहारण है।

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