जेन जेड वर्गीकरण: लूट की व्यवस्था को बढ़ावा देने का हथकण्डा
आजकल जेनरेशन जेड, जेनरेशन अल्फा, जेनरेशन बीटा जैसे नाम खबरों में हैं। दफ्तरों में या युवाओं के बीच जनरेशन के इन शब्दों का चलन अधिक मिलता है। उम्र के हिसाब से पीढ़ियों के इस विभाजन को पीढ़ीगत वर्गीकरण कहा जाता है। इस वर्गीकरण में बताया जाता है कि हर पीढ़ी की अपनी खास विशेषता है जो उसे पिछली पीढ़ी से अलग करती है। यह हमारे समाज में पुराने समय से चले आ रहे वर्गीकरण–– बच्चे, जवान और बुढ़े से अलग है!
आखिर इस नये वर्गीकरण की जरूरत क्या है? यह किन उद्देश्यों की पूर्ति करता है? समाज के किस वर्ग को इससे लाभ है? इन सवालों को जानने के लिए हमें देखना होगा कि आखिर इसकी शुरुआत कहाँ से हुई है। इस वर्गीकरण के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आधारों को देखना भी जरूरी है।
हंगरी के एक समाजशास्त्री कार्ल मैनहेम ने सबसे पहले इस विषय पर शोध किया और 1928 में “प्रॉब्लम ऑफ जेनरेशन” नाम की पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने पीढ़ियों की अलग–अलग विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की और बताया कि ये विशेषताएँ सामाजिक बदलाव का प्रमुख कारक होती हैं। इस एकांगी विश्लेषण में कार्ल मैनहेम ने आर्थिक कारकों को गौण माना और सांस्कृतिक कारकों की भूमिका को बढ़ा–चढ़ा कर पेश किया। मैनहेम के पीढ़ियों वाले सिद्धान्त को उस समय स्वीकार्यता नहीं मिली थी। इसमें कई खामियाँ थीं, जैसे ये सभी वर्गों की पीढ़ियों पर सामान रूप से लागू नहीं होता था।
आज कई संस्थाएँ कार्ल मैनहेम के सिद्धान्त पर आगे काम कर रही हैं। लेकिन इसका उपयोग पूँजीवादी बाजार के हितों को पूरा करने के लिए हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया की मार्क मैकक्रिण्डल रिसर्च संस्था इस क्षेत्र में अग्रणी है। इसके संस्थापक मार्क मैकक्रिण्डल को नयी पीढ़ियों के नामकरण का जनक माना जाता है। उनकी संस्था लोगों की मानसिक स्थिति, व्यवहार और प्राथमिकता का विश्लेषण कर पीढ़ियों का वर्गीकरण करती है। यह विश्लेषण बाजार को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने, कर्मचारियों से उत्पादन बढ़ाने और नये उत्पादों को डिजाइन करने में मदद करता है। भारत में स्मार्टफोन, नेटफ्लिक्स, अमेजॅन प्राइम वीडियो जैसे ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स और ई–कॉमर्स की बिक्री में वृद्धि का एक बड़ा कारण यह है कि कम्पनियाँ पीढ़ियों की ऑनलाइन जीवनशैली को ध्यान में रखकर उत्पाद की बिक्री करती हैं। इस तरह पीढ़ियों का विश्लेषण कम्पनियों के लिए काफी उपयोगी है।
मार्क मैकक्रिण्डल पीढ़ियों को उम्र के हिसाब से अलग–अलग नाम देते हैं और उनकी विशेषताएँ बताते हैं––
(1) जेनरेशन जेड (1997–2012) डिजिटल युग में पली–बढ़ी पीढ़ी है। ये लोग पढ़ाई, दोस्ती, गेमिंग और नौकरी की तलाश ऑनलाइन करते हैं। वे एक नौकरी में लम्बे समय तक नहीं टिकते, बल्कि बार–बार बदलते हैं। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता और ऑनलाइन आय (जैसे यूट्यूब, फ्रीलांसिंग) उनके लिए आकर्षक हैं।
(2) जेनरेशन अल्फा (2013–2025) पीढ़ी छोटी उम्र से ही स्मार्टफोन और स्क्रीन के साथ बड़ी हो रही है। वे ऑनलाइन ऑर्डर और त्वरित डिलीवरी की अपेक्षा रखते हैं। वे यूट्यूब से सीखते हैं, गूगल से सवाल पूछते हैं और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर जागरूकता दिखाते हैं। ये स्वभाव से गुस्से वाले होते हैं। भारत में मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे कम उम्र में कोडिंग या वीडियो एडिटिंग सीख रहे हैं।
(3) जेनरेशन बीटा (2025 के बाद) अभी जन्म ले रही यह पीढ़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), रोबोट और वर्चुअल रियलिटी के युग में पलेगी। तकनीक उनके लिए उतनी ही स्वाभाविक होगी जितना हवा और पानी। उनकी शिक्षा, खरीदारी और सामाजिक जीवन व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार अनुकूलित होगा। वे ऑनलाइन दोस्ती और काम करेंगे लेकिन अपनी अलग पहचान बनाना चाहेंगे।
कम्पनियाँ इनके आधार पर लक्षित विज्ञापन, उत्पाद और सेवाएँ डिजाइन करती हैं। उदाहरण के लिए भारत में अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी ई–कॉमर्स कम्पनियाँ जेनरेशन जेड और अल्फा की तुरन्त डिलीवरी की चाहत को भुनाती हैं। ऐपल और सैमसंग जैसे ब्राण्ड्स जेनरेशन जेड की सोशल मीडिया सक्रियता को ध्यान में रखकर महँगे फोन लॉन्च करते हैं, जिन्हें मध्यम और निम्न–आय वर्ग ईएमआई पर खरीदने को मजबूर होते हैं।
लेकिन यह वर्गीकरण केवल बिक्री तक सीमित नहीं है बल्कि यह उस पूँजीवादी संस्कृति का अंग बन गयी है जो लोगों में आर्थिक असमानता, उपभोक्तावाद, स्वार्थपरता, संकीर्णता, सच्चाई से दूर होना आदि को बढ़ावा देती है। इसलिए यह पूँजीवादी संस्कृति के विष वृक्ष के साथ मिलकर कई गम्भीर समस्याओ को पैदा करता है जैसे––
(1) आर्थिक समानता का भ्रम
यह भ्रम पैदा करता है कि एक ही पीढ़ी के सभी लोगों के अवसर और जीवनशैली समान हैं। लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न है। उदाहरण के लिए, जेनरेशन जेड में एक अमीर परिवार का युवा स्टार्टअप शुरू कर सकता है या विदेश में पढ़ाई कर सकता है, क्योंकि उसके पास पूँजी और संसाधन हैं। वहीं एक मजदूर परिवार का युवा जो एक डिलीवरी बॉय के रूप में कम वेतन और बिना सामाजिक सुरक्षा के 12–14 घण्टे काम करता है। फिर भी दोनों को तकनीक प्रेमी कहकर एक ही श्रेणी में रखा जाता है। पीढ़ीगत वर्गीकरण इस सच्चाई को छिपाकर पूँजीपति वर्ग को लाभ पहुँचाता है।
(2) उपभोक्तावाद और शोषित वर्ग पर बोझ
हमने बताया है कि पीढ़ीगत विशेषताएँ मालों की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए बनायी जाती हैं। उदाहरण के लिए, जेनरेशन अल्फा को स्क्रीन पर गेम खेलने वाला बताकर गेमिंग डिवाइस और ऐप्स की बिक्री को प्रोत्साहित किया जाता है। भारत में मध्यम और निम्न–आय वर्ग के परिवार महँगे स्मार्टफोन, लैपटॉप, या इंटरनेट प्लान खरीदने के लिए कर्ज लेते हैं, क्योंकि सोशल मीडिया और बाजार उन्हें यह विश्वास दिलाते हैं कि ये उनकी पीढ़ीगत पहचान का हिस्सा हैं। इससे कम्पनियों का मुनाफा बढ़ता है, जबकि आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।
हम आये दिन अपने आस–पास इसके उदाहरण देखते हैं कि कैसे कम वेतन की नौकरी करने वाले युवा एप्पल के स्मार्टफोन ईएमआई पर खरीदते हैं और इसके चलते लगातार परेशान रहते हैं। इस शोषण को आधुनिक जीवनशैली के नाम पर बढ़ावा दिया जाता है।
(3) शोषण को छिपाना
पीढ़ीगत वर्गीकरण शोषण को छिपाने का एक तरीका है। यह बताता है कि जेनरेशन जेड लचीली और जल्दी–जल्दी नौकरी बदलने वाली है। इससे यह तथ्य छिपा दिया जाता है कि नौकरी बदलने की मजबूरी अक्सर अस्थिर नौकरियों, कम वेतन और खराब कार्यस्थल परिस्थितियों के कारण होती है। भारत में जेनरेशन जेड के लाखों युवा डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर या कॉल सेंटर में बिना स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, या सुरक्षा के लम्बे समय तक काम करते हैं। पीढ़ीगत वर्गीकरण इसे लचीलापन या स्वतन्त्रता के रूप में प्रचारित करता है। वह इस शोषण को युवा ऊर्जा या डिजिटल युग की विशेषता के रूप में पेश करता है। वह शोषित वर्ग की एकजुटता और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष को कमजोर करता है।
(4) वर्ग चेतना को कमजोर करना
पूँजीवादी संस्कृति की विशेषता होती है कि वह लोगों की वर्ग चेतना को कमजोर करती है। उसी तरह भारत में अमीरी–गरीबी की खाई गहरी है। व्यवस्था को चलाने वाले जानते हैं कि गरीबों की वर्गीय चेतना उनके लिए घातक है। इसलिए वर्गीय चेतना से लोगों को दूर रखकर ही शोषक वर्ग अपनी सत्ता बनाये रख सकता है।
पीढ़ीगत वर्गीकरण भी जनता की चेतना को कमजोर करने का काम करता है। जब सभी को सोशल मीडिया प्रेमी जैसे लेबल दिये जाते हैं, तो शोषित वर्ग अपनी खराब आर्थिक स्थिति को सामाजिक–आर्थिक संरचना के बजाय व्यक्तिगत असफलता से जोड़कर देखता है। एक ब्लिंकिट का डिलीवरी बॉय यह सोचता है कि वह इन्फ्लुएंसर या उद्यमी नहीं बन पाया, क्योंकि उसमें प्रतिभा की कमी है, न कि इसलिए कि उसके पास पूँजी, शिक्षा, या अवसरों की कमी है।
(5) सांस्कृतिक और आर्थिक नियन्त्रण
पीढ़ीगत वर्गीकरण एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देता है, जो शोषक वर्ग के लिए अनुकूल है। जेनरेशन बीटा को एआई और वर्चुअल रियलिटी के साथ सहज बताया जाता है। उन्हें ऑन लाइन प्लेटफार्म पर दोस्ती करने वाला बताया जाता है जो उन्हें धीरे–धीरे वस्तिकता से काट देता है। वह इस संस्कृति को अपनाने के लिए मजबूर हैं क्योकि इसे उनकी पहचान के रूप में दिखाया गया है। यह सांस्कृतिक नियन्त्रण लोगों की स्वतंत्र सोच को सीमित करता है। आज सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर बनने की होड़ में लाखों युवा अपनी वास्तविक समस्याओं–– जैसे शिक्षा की कमी, बेरोजगारी, या सामाजिक असमानता से ध्यान हटा चुके हैं। उन्हें अमीर बनने का एक सुनहरा सपना दिखया जाता है। यह शोषक वर्ग के हित में है क्योंकि यह शोषित वर्ग को संगठित होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने से रोकता है।
साथ ही ये सांस्कृतिक विविधता के लिए भी खतरा है। भारत में जहाँ हर क्षेत्र की अपनी भाषा, परम्परा और संस्कृति है, लेकिन वर्गीकरण एकसमान विशेषताओं को थोपता है। जेनरेशन जेड को सोशल मीडिया प्रेमी कहना पंजाब के एक गाँव के युवा और मुम्बई के शहरी युवा की सांस्कृतिक भिन्नता को नजरअन्दाज करता है। यह साम्रज्यवादी संस्कृति को बढ़ावा देता है, जिससे स्थानीय परम्पराएँ, जैसे–– लोक गीत या हस्तकला भी कमजोर पड़ रही है।
(6) पीढ़ियों के बीच अलगाव
पूँजीवादी संस्कृति की तरह ही यह वर्गीकरण हम और वे की भावना को बढ़ावा देता है। कार्यस्थलों पर पुराने कर्मचारी नये युवाओं को जेन–जेड कहकर कोसते हैं और नीचा समझते हैं ऐसे उदहारण दफ्तरों और किशोरों के बीच सुनने को मिलते है। जहाँ किसी युवा को जेनरेशन जेड या जेनरेशन अल्फा के आधार पर उपेक्षित किया जाता है। इस तरह यह अलगाव को बढ़ावा देती है। पुरानी पीढ़ी के पास अपने संघर्षों का अनुभव है जिससे नयी पीढ़ी सीख सकती है। लेकिन पीढ़ियों के बीच इस दूरी से दोनों पीढ़ियों का नुकसान होता है। इस का फायदा किसको होगा? पहले ही बता दिया गया है कि पूँजीपति वर्ग को फायदा मिलता है।
(7) पहचान की सोच को बढ़ावा
जब किसी जेन–जेड की पहचान को “स्क्रीन पर गेम खेलना” या “ऑनलाइन सक्रियता” से जोड़ा जाता है, तो यह हमारी सोच समझ पर गहरा असर डालता है। जिससे हमें लगता है कि नयी पीढ़ी बिगड़ गयी है।
जबकि सच्चाई यह है कि छोटा ही सही लेकिन नौजवानों का एक हिस्सा जाति और धर्म आधारित बटवारे को तर्क संगत नहीं मानता। वह सामाजिक समस्याओं को दूर करने में लगा हुआ है। इस लिए युवा पीढ़ी को भटका हुआ कहना ठीक नहीं है। हालाँकि आज ज्यादातर नौजवान भ्रमित हैं लेकिन यह उनकी पहचान नहीं है। उनके भ्रमों को दूर करके उन्हें बेहतर नागरिक बनाया जा सकता है।
पीढ़ीगत वर्गीकरण पूँजीवादी व्यवस्था में लोगों को बाँटने का एक हथकण्डा है। पूँजीवाद में अतिउत्पादन का संकट एक गम्भीर समस्या है, जहाँ माल बेचना कठिन हो जाता है। इस संकट से निपटने के लिए बाजार एक नयी संस्कृति बनाता है, जो उपभोक्तावाद और व्यक्तिवाद को बढ़ावा देती है। यह विचारधारात्मक नियन्त्रण शोषक वर्ग के लिए लाभकारी है। पीढ़ीगत वर्गीकरण आर्थिक असमानता को छिपाकर मेहनतकश वर्ग को उपभोक्तावादी सपनों में उलझाता है, ताकि वे अपनी स्थिति पर सवाल न उठायें।
Leave a Comment
लेखक के अन्य लेख
- मीडिया
- जीवन और कर्म
-
- भीष्म साहनी: एक जन–पक्षधर संस्कृतिकर्मी का जीवन 13 Sep, 2024
- समाचार-विचार
-
- आयुष्मान भारत योजना : जनता या बीमा कम्पनियों का इलाज? 15 Aug, 2018
- खेल और खिलाड़ियों का इस्तेमाल ‘फेस पॉउडर’ की तरह भी हो सकता है! 16 Nov, 2021
- जन जन तक जुआ, घर घर तक जुआ 17 Feb, 2023
- पेंशन बहाली का तेज होता आन्दोलन 14 Mar, 2019
- लाशें ढोते भारत में सेन्ट्रल विस्टा! 20 Jun, 2021
- अवर्गीकृत
-
- ज्ञानवापी मस्जिद का गढ़ा गया विवाद 20 Aug, 2022