वनतारा चिड़ियाघर
जामनगर गुजरात में करीब 3 हजार एकड़ में दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव बचाव एवं पुर्नवास केन्द्र (एनिमल रेस्क्यू एण्ड रिहैबिलिटेशन सेण्टर) बनाया गया है जिसका मालिक रिलायंस फाउण्डेशन का अनन्त अम्बानी है। रिलायंस फाउण्डेशन की तरफ से सेवा करने वाली संस्था बताकर इसका प्रचार–प्रसार किया जाता है, जहाँ दुर्घटना या पशु–व्यापार से बचाये गये जानवरों का इलाज और देखरेख की जाती है। सोशल मीडिया में अनन्त अम्बानी का हाथियों को खाना खिलाते हुए या सेवा करते हुए वीडियो वायरल कर इसकी छवि चमकाने का काम भी बराबर चलता रहता है।
वैसे तो वनतारा का स्टेटस दुनिया के स्तर पर विवादास्पद ही है क्योंकि इसके काम करने का तरीका बाकी रेस्क्यू सेण्टर्स और एनिमल रिहैबिलिटेशन सेण्टर से काफी अलग और खुफिया है। जी हाँ! खुफिया है। पर भारत में इसकी छवि चमकाने में भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया यहाँ तक कि स्वयं “नॉन–बायलोजिकल” प्रधानमंत्री ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इस सबके चलते जनता में इस संस्था की अच्छी छवि बनायी गयी है, लेकिन मामला तब बिगड़ा जब हरिद्वार में हाथियों से भरा एक ट्रक पकड़ा गया, जिसमें स्थानीय लोगों के अनुसार बिल्कुल स्वस्थ हाथियों को बिना किसी परमिट के वनतारा ले जाया जा रहा था। इस मामले में जानवरों के लिए काम करने वाली गैर–सरकारी संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी वनतारा पर कई आरोप लगाये जिससे सोशल मीडिया में यह पूरा मामला चर्चा में आ गया।
जब स्थानीय पत्रकारों और यूट्यूब ने सच का पता लगाने के लिए इस सेवाकार्य में लीन संस्था से जुड़ी जानकारी जुटाने की कोशिश की तो चैंकाने और शक पैदा करने वाले तथ्य सामने आये। कथित तौर पर वन्यजीव बचाव व पुर्नवास वनतारा वास्तव में एक निजी संस्था है, जिसमें आम जन को घुसने तक की अनुमति नहीं दी जाती है। साथ ही, चूँकि यह एक निजी संस्था है तो आप सूचना के अधिकार के तहत यहाँ से सम्बन्धित कोई भी जानकारी नहीं जुटा सकते। यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों या पशु चिकित्सकों से जानकारी जुटाने की कोशिश की गयी तो पता चला कि यहाँ के सारे स्टाफ से नो डिस्क्लोजर एग्रीमेन्ट (एनडीए) साइन करवाया जाता है, जिससे कि यहाँ की कोई भी जानकारी बाहर न जा सके। यहाँ तक कि कुछ विदेशी पत्रकारों ने जब वनतारा में अन्दर जाने की अनुमति चाही तो उनसे भी एनडीए साइन करवाया गया। ये सभी घटनाएँ किसी भी आम समझदारी वाले व्यक्ति के मन में भी इस संस्था के बारे में शक पैदा करने के लिए काफी हैं, फिर यह हमारे देश में खुलेआम कानूनी संरक्षण में कैसे काम कर पा रही है, यह सवाल अहम है!
रिलायंस फाउण्डेशन से इसी शक पैदा करने वाली प्राइवेसी के सम्बन्ध में पूछे जाने पर जवाब मिलता है कि यहाँ के जानवरों में कई लुप्तप्राय (अटमोस्ट एक्सटिंक्ट), लुप्त होने की कगार पर और गैर–स्थानिक (एग्जटिक स्पीशीज) भी हैं, जिन पर पशु–व्यापार करने वाले गिरोहों की नजर रहती है। ऐसे में इनसे जुड़ी जानकारी के बाहर जाने पर इन जानवरों को खतरा हो सकता है।
भारत के कानून सेन्ट्रल जू ऑथोरिटी (सीजेडए) के अनुसार गैर–स्थानिक प्रजातियों को निजी तौर पर रखना हमारे देश में स्वीकृत ही नहीं है, तो वनतारा को इन जानवरों को लाइसेन्स कैसे मिला? यहाँ पर विदेशी लुप्तप्राय प्रजातियाँ भी हैं, जिनकी तादाद काफी है और विदेशी सरकारों के द्वारा भी इस संस्थान पर जानवरों के अवैध क्रय–विक्रय का आरोप लगाया जाता रहा है। क्या कोई संस्था हमारे देश की प्राकृतिक सम्पदा–– हमारे वन्य जीव–जन्तुओं को जैसे कि शेर–चीता जैसी प्रजातियों को बिना कोई जानकारी सार्वजनिक किये, सिर्फ सेवा–भाव के नाम पर रख सकती है और देश का कानून कोई सवाल नहीं उठाता।
वहीं 2022 में उत्तर प्रदेश के अमेठी के मण्डलवा गाँव में रहने वाले मोहम्मद आरिफ को एक घायल सारस मिला जिसका उन्होंने इलाज कराया और अपने घर पर ही देखभाल के लिए रख लिया। जब यह अनोखी दोस्ती इण्टरनेट पर वायरल हुई तो मार्च 2023 में वन विभाग ने वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत आरिफ को नोटिस भेजा और सारस को उनके कब्जे से लेकर पहले रायबरेली के समासपुर बर्ड सेन्चुरी और बाद में कानपुर के चिड़ियाघर भेज दिया। इस पूरे मामले में सरकार की काफी आलोचना भी हुई, पर सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया।
इससे यह सवाल पैदा होना लाजमी है कि एक आम आदमी जब स्वस्थ दोस्ती के तहस एक सारस को घर पर रखता है तो यह वन्य जीव संरक्षण अधिनियम का उल्लंघन होता है और वहीं कोई गुपचुप तरीके से हजारों की संख्या में ऐसे जानवरों को कैद करके रखता है जिनकी अन्तरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करोड़ों में है। वह भी बिना किसी पब्लिक स्क्रूटनी के, यह कैसे सम्भव है? अगर कुछ गलत होगा तो उसकी जानकारी कैसे होगी?
जब एक निजी संस्था, जो मूल रूप से व्यापार करती है, सेवा करने लग जाये, वह भी इतने गुप–चुप तरीके से, तो दाल में काला होने की सम्भावना प्रबल हो जाती है। आरोप–प्रत्यारोप से इतर भी कुछ तथ्य हैं जिन पर गौर किया जाना जरूरी है।
वनतारा का उपयोग भविष्य में कार्बन क्रेडिट का व्यापार करने के लिए किया जा सकता है। बढ़ते प्रदूषण के चलते भविष्य में सरकार द्वारा तय सीमा से अधिक प्रदूषण फैलाने वाली संस्थाओं पर जुर्माना या भारी टैक्स लगाये जाने का प्रस्ताव बनाया जा रहा है, जिसे कार्बन क्रेडिट खरीद कर कम किया जा सकेगा। वहीं यहाँ रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्लाण्ट (वर्षा जल संचयन संयत्र) भी लगाये गये हैं, जो भविष्य में पानी के व्यापार के लिए काम आयेगा। अब क्योंकि यह संस्था सेवा के नाम पर चलायी जा रही है, तो व्यापार की तैयारी या निजी इस्तेमाल के बावजूद किसी भी प्रकार के टैक्स से मुक्त कैसे है? इससे जुड़े सटीक तथ्यों को बता पाना सम्भव इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि वनतारा की कोई भी जानकारी आम जनता तो क्या पत्रकारों तक भी पहुँचने ही नहीं दी जा रही है।
उत्तराखण्ड की घटना के बाद 2024–25 में पीआईएल लगी और सुप्रीम कोर्ट ने वनतारा को क्लीन चिट भी दे दी, लेकिन एसआईटी की रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गयी। यहाँ तक कि जिन पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह पीआईएल लगायी थी, उन पर 100 करोड़ तक की मानहानि का दावा किया गया। इससे तो साफ है कि अब कोई पत्रकार या एक्टिविस्ट अगली बार वनतारा पर स्टोरी करने या सवाल उठाने से पहले सौ बार सोचेगा!
ऐसा लगता है जैसे रेस्क्यू सेण्टर प्राइवेट होने के साथ ही देश के वन्यजीव और हमारे देश का कानून भी प्राइवेट हाथों में चला गया है। गरीबों के लिए नियम अलग हैं और अमीरों के लिए अलग या कोई नियम और रोक–टोक ही नहीं। सवाल उठाये जाते हैं तो सेवा की बात और 100 करोड़ की मानहानि की नोटिस! जिस संस्था की कोई वार्षिक सार्वजनिक लेखा परीक्षा (एनुअल पब्लिक ऑडिट) नहीं, आरटीआई नहीं, उस पर सरकार का अन्धा भरोसा सवाल पैदा करता है। जब रेगुलेशन ही बन्द कमरे में होगा तो जिम्मेदारी कैसे तय होगी?
एक और अहम सवाल यह उठता है कि देश में वन्य जीव संरक्षण की जिम्मेदारी आखिर है किसकी? किसी प्राइवेट अमीर संस्था की या सरकार की? सरकार अपनी नाकामी और निठल्लेपन की आड़ में अपने आकाओं को न सिर्फ हजारों एकड़ के शिकारगाह उपलब्ध करा रही है, बल्कि एक गम्भीर अपराध को पनपने का अवसर देते हुए निरपराध, अबोध, मूक और पहले से ही खतरे में पड़े हुए वन्यजीवों की जिन्दगियों के साथ खिलवाड़ कर रही है। सरकार इन सूचनाओं को सार्वजनिक न करके इस बात की तस्कीद कर रही है कि इस देश में कुछ चन्द व्यक्ति संविधान से भी ऊपर उठ चुके हैं, जिनकी सेवा में देश की तथाकथित लोकतान्त्रिक सरकार हाजिर ही नहीं, दण्डवत लेटी नजर आती है।
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