दिसंबर 2025, अंक 49 में प्रकाशित

देश भर में कुदरत का कहर

“अब के बारिश में तो ये कार–ए–ज़ियाँ होना ही था,

अपनी कच्ची बस्तियों को बे–निशाँ होना ही था।”

–मोहसिन नक़बी

 

इस साल मानसून से पहले ही शुरू हुई बारिश ने मानसून के बाद तक भारत और पड़ोसी मुल्कों में भारी तबाही मचायी। सरकारी आँकडों के अनुसार बाढ़ और भूस्खलन से देष के सिर का ताज कहे जाने वाले जम्मू और काश्मीर में 41 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, वहीं हजारों लोग बेघर हो गये और लाखों अब भी इस भयानक मंजर के खौफ में जी रहे हैं। बादल फटने के कारण उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी में बाढ़ के साथ आये मलबे ने मिनटों में ही अपने रास्ते में आने वाले गाँवों को साफ कर दिया, इसका वीडियो देखकर किसी की भी रूह काँप जाये। हिमाँचल प्रदेश में बाढ़ की तबाही ने पर्यटन आधारित इस राज्य की कमर तोड़ कर रख दी है। टूटे हाईवे, पुल और क्षतिग्रस्त सड़कों ने इन राज्यों का सम्पर्क देश के बाकी हिस्सों से काट दिया, जिससे यहाँ की विशेष फसल– सेब और नाशपाती बाजारों तक नहीं पहुँच पाये और रास्ते में ही सड़ गये। होटल, रिजॉर्ट, मकान, दुकान के साथ ही लोगों की साल भर की मेहनत और लागत भी बाढ़ के पानी में डूब गयी।

भारत का व्हीट बोल कहा जाने वाला पंजाब अभी 2023 के नुकसान से उबर भी नहीं पाया था कि इस साल की बाढ़ ने करीब पैंतालीस हजार एकड़ जमीन पर कटाई के लिए तैयार फसल का नाश कर दिया, यह जगह करीब उतनी ही है, जितने में पूरा मारीशस समा जाये! गौरतलब है कि पंजाब की 35 प्रतिशत से ज्यादा आबादी खेती बाड़ी पर निर्भर है। ऐसे में यह नुकसान सिर्फ फसलों का नहीं, जनजीवन का भी है। किसानों के खेतों में भरी रेत ने खेतों को अगली फसल बोने लायक भी नहीं छोड़ा है।

राइस बोल कहे जाने वाले बंगाल में हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं। मेघालय, असम में भी प्रकृति ने भीषण तबाही मचायी जिसमें करीब सवा छ: लाख लोग प्रभावित हुए। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार सितम्बर तक इन प्राकृतिक आपदाओं ने 1500 लोगों की जान ले ली है। गौर फरमाइयेगा! ये सिर्फ सरकारी आँकड़े हैं! ( जैसे कोरोना काल में बहुत कम करके दिये गये थे, जब वास्तविकता में घाट लाशों से पटे पड़े थे।)

इस विभीषिका को प्राकृतिक आपदा के रूप में देखना प्रकृति के साथ नाइनसाफी करना होगा। ऐसी घटनाओं को व्यवस्था निर्मित, पूँजीवादी और राजनैतिक आपदाओं जैसे किसी नाम से सम्बोधित किया जाना ही वैज्ञानिक और तर्क सम्मत है। व्यवस्था चाहे कितनी ही लीपा–पोती कर ले, सत्ता की धौंस और सेना–पुलिस का डर दिखाकर, वह आमजन का मुँह कुछ समय के लिए बन्द कर सकती है, पर प्रकृति को अपने साथ हुए अन्याय का जवाब देने से नहीं रोक सकती। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि जैसे–जैसे बड़ी–बड़ी कम्पनियों और सरकारी गठजोड़ से प्रकृति का अन्धाधुंध दोहन बढ़ता जा रहा है, वैसे–वैसे प्रकृति का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। भारत ही नहीं दुनिया के स्तर पर ऐसी तबाहियों का सिलसिला जारी है, चाहे वह हाल ही में फिलीपीन्स और अफगानिस्तान के भूकम्प हों, लॉस एंजेल्स के जंगलों की आग हो, जमैका में समुद्री तूफान मेलीसा की तबाही हो या साल 2020 की आस्ट्रेलिया के जंगलों की आग हो, प्रकृति जब भी रौद्र रूप में आयी, बड़े–बड़े तकनीकी रूप से समृद्ध देश भी प्रकृति के हाथों का खिलौना मात्र बन कर रह गये।

हमारे देश में हुई इस तबाही में जनता एक–दूसरे के साथ मजबूती से खड़ी नजर आयी। किसान आन्दोलन के दौरान जिन पंजाब के किसानों को खालिस्तानी और आतंकवादी बताया जा रहा था, उन्हीं के ट्रैक्टरों ने पंजाब में राहत सामग्री वितरित करने का जिम्मा बखूबी उठाया। वहीं इस पूरे घटनाक्रम में हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक सरकारोंे की क्या भूमिका थी, इस पर भी एक नजर डाल लेते हैं। पंजाब की राज्य सरकार ने प्रति एकड़ 20 हजार रुपये मुआवजा, पूरा घर ढहने की स्थिति में एक लाख बीस हजार रुपये और गाय–भैंस के लिए 37,500 रुपये मुआवजा राशि देने का ऐलान किया है। हालाँकि यह राशि ऊँट के मुँह में जीरा बराबर है। वहीं केन्द्र सरकार ने 1600 करोड़ रुपये की मदद पंजाब को देने की घोषणा की(वैसे ही जैसे हर खाते में पन्द्रह लाख देने की घोषणा की थी!), पर यह किस मद में खर्च होंगे, इसकी कोई योजना केन्द्र सरकार ने साझा नहीं की। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने मृत्यु और घर तबाह होने के मुआवजे के लिए पाँच लाख रुपये दिये जाने का ऐलान किया है। इन ऐलानों की हकीकत यह है कि पहले तो मृतकों के परिजनों को यह साबित करने में सालों बीत जाते हैं कि उनके स्वजन की मौत प्राकृतिक आपदा से हुई है, फिर सरकारी दफ्तरों में महीनों चक्कर काटने और अधिकारियों–बाबुओं का हिस्सा निकाल देने के बाद छुट–पुट मदद ही जनता तक पहुँच पाती है, वह भी कई बार इतनी देरी से, कि उसके मिलने का फायदा भी नहीं होता। वास्तविकता यही है कि आपदाओं में जारी की गयी सरकारी मदद जनता का भला करने से ज्यादा नेताओं, अफसरों की जेबें भरने के काम आती हैं।

साल दर साल बढ़ती इन आपदाओं के कारणों पर भी बात जरूरी है। वैसे तो इस तरह की आपदा के पीछे कई कारण काम करते हैं, जिनमें से कुछ मुख्य कारण हैं–

बदलते मानसून और जलवायु संकट ने मौसम के चक्र को बिगाड़ दिया है। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बादलों मंे ज्यादा नमी हो जाती है और छोटे क्षेत्रफल में भारी बारिश होती है, जिसे क्लाउड बर्स्ट या बादल फटना कहते हैं। इसके अलावा निश्चित समय से मानसून न आने से बारिश और गर्मी के महीनों का अंतर कम हो रहा है, जिससे पहाड़ों को सूखने का मौका नहीं मिलता और उनमें लगातार रहने वाली नमी उन्हें कमजोर कर, भूस्खलन का कारण बनती है। इसके साथ ही पश्चिम से आने वाली कम दाब वाली हवायें मानसून से छेड़छाड़ का काम करती हैं। जड़ में इसका कारण भी ग्लोबल वॉर्मिंग ही है। पिघलते ग्लेशियरों के कारण नदियों का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है, जो नीचे जाकर बाढ़ का कारण बनता है। प्रकृति पर फतह पा लेने और मुनाफाखोरी की चाहत में पूँजीपति वर्ग प्रकृति को गुलाम बनाने की कोशिश करता है। कभी पर्यटन के नाम पर पहाड़ों का सीना चीर सुरंगे बना कर, पहाड़ियों को साफ कर होटल और रिजॉर्ट बना कर, तो कभी नदियों का प्राकृतिक बहाव रोक कर उनमें बाँध बना कर वह प्रकृति से छेड़छाड़ करता है। सड़क, पुल आदि बनाने के बाद निकले मलबे का सही तरीेके से निस्तारण न कर उसे नदी में छोड़ देना जो नदी की निचली सतह पर जमा हो कर पानी के स्तर को उठने पर मजबूर कर देता है। जंगलों की अन्धाधुंध कटाई पहाड़ों की जड़ को कमजोर कर रही है। विभिन्न सड़क परियोजनाओं की भी इस तबाही में ठोस भूमिका हैं, जैसे––

केदारनाथ–बद्रीनाथ–यमुनोत्री–गंगोत्री को जोड़ने वाला हाईवे। इन सुरंगों का मलवा भी इन्हीं नदियों के तल पर जमा है, जिन्होंने भारी तबाही मचायी।

विकास की रंगीन पन्नी में लपेटकर हमें यह विनाश परोशा जा रहा है। यह महज मुनाफा बनाने के लिए या एक खास वर्ग को सुविधा पहुँचाने के लिए है लेकिन इसकी कीमत कौन चुका रहा है यह सोचने की बात है! दुर्गम पहाड़ों पर, जहाँ तक जाने के लिए कठिन ट्रैक करना पड़ता था, वहाँ हेलीपैड बनाये जा रहे हैं, किसके लिए? पहाड़ी लोग तो पैदल और खच्चरों के साधन से ही प्रकृति के साथ ताल–मेल बिठाकर अपनी जिन्दगी चला रहे थे, फिर ये मोटरों को पहाड़ों की चोटी तक पहुँचा देने की कवायद किसके लिए? घने जंगलों को साफ कर आलीशान रिजॉर्ट बनाये जा रहे हैं, इनका मालिक कौन है? वे कौन हैं जो इनमें रहने आयेंगे? इन सवालोें के जवाब में ही असली कारण छुपा है। विकास के नाम पर पहाड़ों से प्राकृतिक सम्पदा को लूटने वाले ही इन समस्याओं की असली वजह हैं। जिस देश मेें खाना बनाने के लिए जंगल के पेड़ों को काटे जाने पर पुलिसिया कार्यवाई का कानून है, वहाँ बिहार के भागलपुर में 1050 एकड़ जमीन पूँजीपतियों को कौड़ियों के भाव देकर, लाखों पेड़ों को काटने की अनुमति भी सरकार दे देती है। यही नहीं स्थानीय निवासी जब अपने जंगल और जमीन को बचाने आगे आते हैं, तो उन्हें बेरहमी से पीटकर जेलों में ठूँस दिया जाता है।

चाहे वो हसदेव के जंगल हों या तेलंगाना के कांचा गाचीबावली जंगल या रायगढ़ के जंगल, सबको उजाड़ने के पीछे एक ही वजह है–– मुनाफे की हवस! अक्सर ये प्रकृति विरोधी इन आपदाओं को विकास की कीमत चुकाना कहते हैं। पर सच तो यह है कि विकास प्रकृति के साथ ताल–मेल बिठा कर भी बखूबी हो सकता है। इसे सतत विकास या सस्टेनेबल डेवलपमेंट कहते हैं, जहाँ हम आज की जरूरतों को प्राकृतिक संसाधनों से पूरा तो करते हैं, पर आने वाली पीढ़ियों के लिए इन्हें संरक्षित करने की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। मुनाफाखोर पूँजीपतियों और उनकी सहयोगी सरकारें इसी जिम्मेदारी से मुँह चुराती हैं और धरती के साथ–साथ समूची मानवता के भविष्य से खिलवाड़ कर रही हैं। वक्त आ चुका है कि इस विनाश के विरुद्ध आवाज उठायी जाये, वरना “कल बहुत देर हो जायेगी!”

Leave a Comment