अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

छात्रवृत्ति घोटालों के बढ़ते मामले

बीते जुलाई महीने में राजस्थान से छात्रवृत्ति घोटाले को लेकर चैंकाने वाली खबर सामने आयी है। राज्य के 300 से अधिक स्कूल और कॉलेजों पर करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति हड़पने का आरोप लगा है। छात्रों के लम्बे संघर्ष के बाद ही इनके खिलाफ जाँच हो पायी। जाँच में अनेकों शिक्षण संस्थान तो केवल कागजों पर ही मिलें, कुछ एक दो कमरों के कॉलेज मिले, इनमें बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा चल रहा था। कई कॉलेज में छात्रों की फर्जी अटेण्डेंस लगाने के लिए ‘रबर के अँगूठे’ यानी नकली अँगुलियों के निशान का इस्तेमाल किया जा रहा था। कई में छात्रों के बैंक अकाउण्ट को धोखे से अपने नियंत्रण ले कर पैसे निकाले जा रहे थे। इस पूरे घोटाले में सैकड़ों छात्रों के हक का पैसा निजी शिक्षण संस्थान हड़प गये हैं।

यह कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि अनेक राज्यों से आये दिन छात्रवृत्ति घोटालों के मामले सामने आ रहे हैं। जाँच एजेंसियों की रिपोर्टों से पता चलता है कि घोटालों में नीचे से लेकर तक, कोई शिक्षण संस्थान शामिल हैं। इन रिपोर्टों में धोखाधड़ी के तौर–तरीकों में एक समान पैटर्न दिखाई दे रहा है। एक तरफ निजी शिक्षा संस्थानों द्वारा ऐसे छात्रों के नाम पर उगाही किया गया जो पूरी तरह फर्जी थे या जिनके दस्तावेजों में बड़े पैमाने पर हेरफेर की गयी थी। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि काल्पनिक छात्रों और कई जगह तो दिहाड़ी मजदूरों और रिक्शा चालकों को छात्र दिखाकर भी छात्रवृत्ति में धोखाधड़ी की गयी है। इसी तरह फर्जी संस्थानों के नाम पर भी छात्रवृत्ति घोटाले सामने आ रहे हैं। घोटाले का ऐसा ही मामला 2023 में झारखण्ड से सामने आया था जिसमें 800 से ज्यादा फर्जी संस्थानों को अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति योजना के पैसों को हड़पते हुए पाया गया था। इन्होंने छात्रों को मिलने वाले करीब 150 करोड़ रुपये लूट लिये थे। उत्तराखण्ड में सैकड़ों फर्जी शिक्षण संस्थान भी सामने आये जो एक–दो कमरों में ही संचालित हो रहे थे और छात्रवृत्ति की उगाही कर रहे थे।

इस पूरे घोटाले में निजी शिक्षण संस्थानों के साथ ही छात्रवृत्ति विभाग और बैंक अधिकारी भी लिप्त हैं। ओडिशा छात्रवृत्ति घोटाले की जाँच में सामने आया कि 500 से अधिक  निजी संस्थानों में से अधिकारियों द्वारा केवल 12 प्रतिशत का ही सत्यापन किया गया था। हैरानी की बात यह है कि इस सत्यापन के अगले दो वर्षों में एक भी संस्थान की जाँच नहीं की गयी थी। इसी जाँच में फर्जी लाभार्थियों, दोहरे भुगतान और एक ही बैंक खाते से कई लाभार्थियों को छात्रवृत्ति देने जैसी गड़बड़ियाँ सामने आयी थीं। अनेक राज्यों में ऐसा ही हाल देखने को मिल रहा है। झारखण्ड में तो ऐसे संस्थानों के नाम पर भी छात्रवृत्ति जारी हुई थी जो राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल पर पंजीकृत तक नहीं थे।

हिमाचल प्रदेश के छात्रवृत्ति घोटाला में सरकारी अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे थे। साथ ही इन घोटालों की जाँच में शामिल ईडी और सीबीआई के अधिकारियों पर भी रिश्वत लेकर शिक्षण संस्थानों का साथ देने का आरोप साबित हुआ है। इस छात्रवृत्ति घोटाले में 22 निजी संस्थानों से जुड़े करीब 265 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति वितरण की जाँच में सामने आया कि करीब 80 प्रतिशत राशि निजी शिक्षण संस्थानों को दी गयी थी। जाँच में फर्जी बैंक खातों और फर्जी लाभार्थियों के नाम पर छात्रवृत्ति में गड़बड़ी के मामले सामने आये। इसके चलते 32 हजार से अधिक योग्य छात्र छात्रवृत्ति से वंचित रह गये थे।

टाइम्स ऑफ इण्डिया की खबर के अनुसार, 2012 में मध्य प्रदेश में 15 करोड़ रुपये का छात्रवृत्ति घोटाला हुआ था, जिसमें 2016 तक राज्य सरकार ने घोटाले में शामिल अधिकारियों और संस्थानों पर कोई कार्रवाई नहीं की थी। उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई की गयी। इसमें राज्य सरकार ने कहा था कि घोटाले की 99 प्रतिशत राशि बरामद कर ली गयी है। लेकिन बाद में पता चला कि सिर्फ 8 प्रतिशत राशि ही बरामद की गयी थी। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने संस्थानों के खिलाफ चल रही रिकवरी प्रक्रिया पर रोक लगाकर सील किये गये संस्थानों को दोबारा खोलने का आदेश जारी कर दिया था।

महाराष्ट्र में भी 2010–2015 के बीच हुए बड़े छात्रवृत्ति घोटाले में 2017 तक राज्य सरकार लगभग दो हजार करोड़ रुपये से अधिक की रकम के मुकाबले केवल 64 करोड़ रुपये की रिकवरी करवा पायी थी। आज तक इन दोनों मामलों में किसी आरोपी को सजा दिये जाने की कोई खबर नहीं है। अन्य मामलों में भी न्यायालयों का रवैया बेहद निराश करने वाला रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्य प्रदेश के छात्रवृत्ति घोटाले में रिकवरी पर रोक और सील संस्थानों को दोबारा खोलने का आदेश जारी किया जाना इसी का उदाहरण है।

चिन्ता की बात यह भी है कि छात्रवृत्ति घोटाले के अधिकतर मामले अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे वंचित समाजों से, यानी उन हजारों–लाखों छात्रों से जुड़े हैं, जिनके लिए शिक्षा तक पहुँच पहले से ही आर्थिक और सामाजिक बाधाओं से घिरी हुई है। छात्रवृत्ति घोटाले को केवल भ्रष्टाचार की अलग–अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय इसे उस व्यापक शिक्षा व्यवस्था के सन्दर्भ में भी देखना होगा जिसमें शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च और उसकी सामाजिक पहुँच लगातार कमजोर हो रही है। ऐसे में पूरा सिस्टम आग में घी डालने का काम कर रहा है। सरकार लगातार शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है और वहीं पूरा सिस्टम मिल–जुलकर निजी संस्थाओं को वंचित छात्रों के हिस्से की छात्रवृत्ति से अपनी जेबें भरने का पूरा मौका दे रहा है।

सवाल केवल यह नहीं है कि छात्रवृत्ति का पैसा किसने हड़पा, बल्कि सवाल यह भी है कि फर्जी नामांकन, फर्जी दस्तावेज, डुप्लीकेट लाभार्थी, फर्जी संस्थान और संदिग्ध बैंक खाते सरकारी निगरानी को कैसे पार कर गये? और जब एक ही जैसी गड़बड़ियाँ अलग–अलग राज्यों में बार–बार सामने आती हैं, तो उनकी रोकथाम और समय पर कार्रवाई की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?

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