अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पर मुनाफाखोरों की नजर

अगस्त 2026 से असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का मामला गर्माया हुआ है। वहाँ की भाजपा सरकार ने उस उद्यान का क्षेत्र 10 से घटाकर एक किलोमीटर करने का फैसला कर लिया। एक सींग वाले गैंडों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध इस उद्यान पर यह एक घातक हमला है। यह उद्यान ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है जो राज्य के तीन जिलों गोलाघाट, नागाँव और शोणितपुर में फैला हुआ है।

पूरी दुनिया के एक सींग वाले गैंडों की 70 फीसदी से भी अधिक आबादी यहीं पायी जाती है। काजीरंगा में इन गैंडों के अलावा रॉयल बंगाल टाइगर, एशियाई हाथी, जंगली एशियाई जल भैंसे, दलदली हिरण आदि जानवर पाये जाते हैं। इसके चलते यूनेस्को ने 1985 में काजीरंगा को विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर लिया था। 2006 में राज्य सरकार ने काजीरंगा को टाइगर रिजर्व भी घोषित किया था। संरक्षित वन्य क्षेत्र काजीरंगा प्राकृतिक रूप से बेहद खूबसूरत है। 2024–25 के एक वर्ष में ही राज्य सरकार ने लगभग 4 लाख देशी–विदेशी पर्यटकों से 10–90 करोड़ रुपये की कमाई की। इन सब के बावजूद राज्य में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री हेमन्त बिस्वा सरमा और चन्द धन्नासेठों के आपसी गठजोड़ ने काजीरंगा की खूबसूरती और जैव विविधता को दाँव पर लगाकर मुनाफा कमाने की साजिश रच दी है।

हम जानते हैं कि किसी भी संरक्षित क्षेत्र की सुरक्षा 3 स्तरीय जोन में होती है। (1) कोर जोन–– यह सबसे भीतरी हिस्सा होता है जिसमें वन्य जीवों के लिए अधिकतम सुरक्षा होती है। यहीं पर सबसे अधिक जानवर रहते हैं। यहाँ मानवीय गतिविधियों पर प्रतिबन्ध होता है। (2) बफर जोन–– यह कोर जोन के ठीक बाहर की सीमा होती है। यहाँ पर सीमित मानवीय गतिविधियाँ, जैसे इको टूरिज्म और स्थानीय निर्भरता के लिए होती है। (3) इको सेंसटिव जोन–– यह संरक्षित क्षेत्र का सबसे बाहरी हिस्सा होता है। यहाँ वन्य जीव और मानवीय गतिविधियाँ सामान्य होती हैं। इस जोन में खनन, भारी उद्योग और बड़े निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध होता है।

असम के मुख्यमंत्री हेमन्त बिस्वा सरमा ने 3 अगस्त 2024 को टाटा समूह के साथ एक समझौता किया। इसमें काजीरंगा में ताज रिसोर्ट, स्पा और स्टेडियम जैसी व्यवसायिक इमारतों के निर्माण पर खुली छूट होगी। 2026 में हयात ग्रुप से जुड़ी कम्पनी, जुनिपर होटल्स ने असम टूरिज्म डेवलपमेण्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड से लीज पर जमीन लेकर लक्जरी होटल का निर्माण कार्य शुरू भी कर दिया है।

काजीरंगा का क्षेत्र घटाना भाजपा के चहेते उद्योगपतियों के लिए तोहफा है। इससे उन्हेंं यहाँ पर बड़े निर्माण कार्य में पूँजी निवेश और मुनाफा कमाने का मौका मिल जायेगा। सरकार के इस फैसले का विरोध स्थानीय लोग, पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता कर रहे हैं। इनका मानना है कि इको सेंसटिव जोन के 10 किलोमीटर के डिफॉल्ट को घटाने से वन्य जीवों का विचरण क्षेत्रफल घट जाएगा। कोर जोन तक खनन, भारी उद्योग और बड़े निर्माण तेजी से बढ़ेंगे। इसके लिए सड़कें और राजमार्ग बनाये जाएँगे और इनसानी गतिविधियों में बढ़ोतरी होगी। नतीजतन, इनसानों और जानवरों में टकराव होगा और दोनों की सुरक्षा को खतरा होगा। सड़कों पर चलने वाले भरी तेज वाहनों से सड़क पार करते समय वन्यजीव कुचलकर मारे जाएँगे।

प्रणब डोले असम के पर्यावरण और मूलनिवासी अधिकार कार्यकर्ता हैं। डोले ने 28 जून 2026 को स्थानीय लोगों के साथ मिलकर लक्जरी होटल के प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। असम पुलिस ने डोले को 12 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने डोले को विरोध प्रदर्शन का मास्टरमाइण्ड बताया और पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप लगाया। एक सत्र न्यायालय ने 29 जुलाई को उन्हें यह कहते हुए जमानत दे दी कि पुलिस के खिलाफ हिंसा का कोई सबूत नहीं मिला और इसके विपरीत यह पाया गया कि उनकी गिरफ्तारी का नोटिस बहुत देर से दिया गया था। सत्र न्यायालय ने फटकार लगायी।

सरकार सुप्रीम कोर्ट के 2022 में दिये गये बयान से अपने फैसले का बचाव कर रही है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने संरक्षित क्षेत्रों में अवैध खनन और गैरकानूनी गतिविधियों के खिलाफ राज्य सरकारों को फटकार लगायी थी और कहा था कि संरक्षित क्षेत्र के इको सेंसटिव जोन को न्यूनतम एक किलोमीटर रखना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने यह बिल्कुल नहीं कहा था कि जहाँ इको सेंसटिव जोन एक किलोमीटर से अधिक है, उसे भी घटाकर एक किलोमीटर किया जाना चाहिए। लेकिन राज्य की भाजपा सरकार सुप्रीम कोर्ट के बयान को तोड़ मरोड़कर अपना उल्लू सीधा करने में लगी हुई है।

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