दिसंबर 2025, अंक 49 में प्रकाशित

नेपाल में जेन जी आन्दोलन और उसके बाद

10 सितम्बर 2025 को मैंने जेन जी आन्दोलन के बाद एक टिप्पणी लिखी थी जिसे संक्षेप में मैं पाठकों को बताना चाहता हूँ। इस टिप्पणी में मैंने लिखा था कि “नेपाल में 2008 में गणराज्य की स्थापना और इसे एक परिणति तक पहुँचाने में माओवादियों की सफलता से समूचे देश में वामपंथ की लहर फैल गयी। इस घटना से अमरीका दहशत से भर गया। पड़ोस में चीन के होने की वजह से अमरीका यह साहस नहीं कर सका कि वह यहाँ अपने सैनिक उतार सके। परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि वह नेपाल को इण्डोनेशिया भी नहीं बना सका। उसने बड़े धीरज के साथ उचित समय का इन्तजार किया।

“इधर, 2008 के बाद से अब तक के 17 वर्षों में सत्ता के शिखर पर बैठे राजनेताओं के तौर–तरीकों ने, उनके भ्रष्टाचार ने और जनता की बुनियादी माँगों के प्रति उनके उपेक्षापूर्ण व्यवहार ने इन नेताओं और जनता के बीच ऐसी दूरी पैदा की जिसे पाटना असम्भव लग रहा था। केपी ओली हों या शेर बहादुर देउबा––दोनों में कौन ज्यादा भ्रष्ट है यह तय करना मुश्किल है लेकिन प्रचंड का इस कतार में शामिल होना अत्यन्त त्रासद है। बेशक इन दोनों की तुलना में प्रचंड को कम भ्रष्ट कहा जाता है पर प्रचंड तो एक विचारधारा से बन्धे कम्युनिस्ट नेता हैं। उनके साथ “भ्रष्ट” विशेषण लगना इन दोनों के भ्रष्टाचार की तुलना में कई गुना ज्यादा हो जाता है।

“राजतंत्र की समाप्ति से सबसे ज्यादा बेचैनी अमरीका को हुई। 28 फरवरी 2003 को वाशिंगटन में अमरीका के उप सहायक विदेश मंत्री डोनाल्ड कैम्प ने एक आयोजन में बोलते हुए कहा था कि अगर नेपाल में माओवादियों को सफलता मिलती है तो इससे ‘अमरीका के राष्ट्रीय हितों को’ चोट पहुँचेगी।” उन्होंने यह भी कहा था कि नेपाल की स्थिति पर अमरीका ‘हर रोज’ ध्यान लगाए हुए है। यह तब की बात है जब माओवादी जनयुद्ध चल रहा था। दक्षिण एशिया में भारत के सहयोग के बिना अमरीका अपनी चैधराहट नहीं चला सकता और भारत सदा से ही राजशाही का साथ देता रहा। नेपाल के सन्दर्भ में इसका मूल सिद्धान्त था ‘ट्विन पिलर थ्योरी’ यानी दो स्तम्भों का सिद्धान्त–– एक स्तम्भ राजतंत्र और दूसरा राजनीतिक दल। नेपाल की स्थिरता के लिए वह इसे जरूरी मानता था। इन सबके बावजूद प्रचंड के नेतृत्व वाली जनमुक्ति सेना ने राजा ज्ञानेन्द्र के नेतृत्व वाली शाही नेपाली सेना को करारी शिकस्त दी और राजधानी काठमाण्डो को चारों तरफ से घेर लिया। अमरीका मन मसोस कर रह गया।

“अब अमरीका ने नेपाली सेना में घुसपैठ शुरू की और गणराज्य बनने के बाद यह काम बड़ी तेजी से हुआ। अब तक परम्परागत तौर पर माना जाता रहा है कि भारत और नेपाल की सेना के बीच एक बिरादराना सम्बन्ध है। यह बात सच भी है। इस बारे में यहाँ विस्तार से लिखने का समय नहीं है लेकिन अमरीका के घुसपैठ पर आम तौर पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। अगर इस तरफ प्रचंड का ध्यान दिलाया गया तो इसे उन्होंने बहुत हल्के में लिया। एक अपुष्ट जानकारी के अनुसार नेपाली सेना के 200 से भी ज्यादा अधिकारी अमरीका के लाभभोगी हैं और यह सिलसिला लम्बे समय से चल रहा है।

“सोशल मीडिया पर लगाए गये प्रतिबन्ध को बहाना बनाकर ‘जेन जी’ का जो आन्दोलन शुरू हुआ, वह निश्चित रूप से युवकों की जेनुइन माँगों को लेकर था और पहली नजर में स्वत:स्फूर्त लग रहा था पर स्वत:स्फूर्त नहीं था, बाकायदा अच्छी तरह संगठित और व्यवस्थित था। इन युवकों की जेनुइन शिकायतों का अपने पक्ष में इस्तेमाल करने वाली ताकतें परदे के पीछे से संचालन कर रही थीं और अमरीका नेपाल में जनतंत्र विरोधी, गणराज्य विरोधी, वामपंथ विरोधी अपने एजेंडा को लागू करने और प्रतिक्रान्ति को अंजाम देने के लिए कमर कस कर मैदान में आ गया। इसका आभास मुझे आन्दोलन के दूसरे ही दिन हो गया जब खबर आयी कि सेना प्रमुख ने प्रधान मंत्री केपी ओली को इस्तीफा देने को कहा है। इससे पहले कभी भी नेपाल में किसी सेना प्रमुख ने यह साहस नहीं किया था कि वह निर्वाचित प्रधानमंत्री को आदेश/निर्देश दे। जितने बड़े पैमाने पर आन्दोलनकारियों द्वारा सरकारी सम्पत्ति नष्ट की गयी उससे भी देश और जनता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का पता चलता है।

“इस आन्दोलन का संचालन कौन लोग कर रहे थे, इसकी जानकारी अब धीरे धीरे सामने आ रही है। मुख्य किरदारों में हैं–– बालेन्द्र (बालेन) शाह जो काठमाण्डो का मेयर है और सुदन गुरुंग जो ‘हामी नेपाल’ नामक एनजीओ का संचालक है। टाइम पत्रिका के 2023 के टाप 100 लोगों में बालेन शाह का नाम है। सुदन गुरुंग के ‘हामी नेपाल’ नामक एनजीओ को कुछ अमरीकी कम्पनियों से करोड़ों रूपये की वित्तीय सहायता मिली है।

“अभी कुछ भी कहना कि भविष्य में नेपाल कौन सी दिशा लेगा, हड़बड़ी होगी। तो भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि नेपाल अपने इतिहास के सबसे भीषण दौर से गुजर रहा है। दो दिनों के पागलपन के बाद अब नेपाल के विचारवान लोग भी आत्ममंथन कर रहे हैं कि यह सब कैसे हुआ!

बहुत सजग और सतर्क रहने की जरूरत है। ”

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मैंने अपनी टिप्प्णी इस वाक्य से समाप्त की थी कि ‘अभी कुछ भी कहना कि भविष्य में नेपाल कौन सी दिशा लेगा, हड़बड़ी होगी’, लेकिन जेन जी आन्दोलन के बाद नेपाल के राजनीतिक रंगमंच पर एक नाटक शुरू हो गया है जिसे आप ऐब्सर्ड थिएटर कह सकते हैं। इस नाटक के सभी किरदार वही हैं जिन्हें जेन जी आन्दोलनकारियों ने दौड़ा–दौड़ा कर पीटा था, जिनके घरों को जला दिया था और जिन्होंने अपनी जान बचाने के लिए सेना की छत्रछाया में कैंटोनमेंट में पनाह ली थी। वे सभी किरदार अब अपना रंगरूप बदलने में, नया मेकअप करने में और नये परिधान धारण करने में लगे हैं ताकि जनता को फिर धोखा दे सकें। ये वही लोग हैं जो किसी जमाने में पूजनीय थे। प्रचंड जैसे लोग भी हैं जिनके बारे में 2006 में कहा जाता था कि वह समूचे दक्षिण एशिया को एक नयी रोशनी देंगे, एक नया रास्ता दिखायेंगे। जिन लोगों ने प्रचंड की पहली भारत यात्रा देखी होगी उन्हें याद होगा कि किस तरह सार्वजनिक समारोह में प्रचंड के एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और दूसरी तरफ पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल उनके हाथ में हाथ डाले बैठे हुए थे। इसी बैठक में आईके गुजराल ने कहा था कि हमने रूस की क्रान्ति नहीं देखी, चीन की क्रान्ति नहीं देखी, वियतनाम की क्रान्ति नहीं देखी लेकिन लेनिन, माओत्से तुंग और हो ची मिन्ह की जगह आज प्रचंड को साक्षात देख रहा हूँ। शायद प्रचंड के लिए इससे बड़ा सम्मान कोई नहीं हो सकता था। उन्हें खुद थोड़ा रुक कर यह सोचने की जरूरत है कि पिछले 20 वर्षों के दौरान किसी न किसी रूप में वह बराबर नेपाल की सत्ता के शीर्ष पर रहे फिर ऐसा उन्होंने क्या कर दिया कि युवा पीढ़ी का रोष उनके प्रति भी इतना तीव्र दिखाई दे रहा था। ये नेतागण अगर कैंटोनमेंट में शरण नहीं लेते तो शायद जिन्दा भी नहीं रहते।

इस उपलब्धि पर शर्मिंदा होना भी बहुत मामूली बात है लेकिन ये लोग तो अब नया मेकअप कर फिर से मंच पर आने की तैयारी में लगे हैं। अब भी नेतृत्व अपने हाथ में रखने के मोह से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।

जुलाई 2006 में मैंने उस समय प्रचंड का इंटरव्यू किया था जब वह अर्धभूमिगत अवस्था में थे। उस समय मैंने प्रचंड से पूछा था कि क्या गारण्टी कि सत्ता में आने के बाद आप भ्रष्ट नहीं हो जायेंगे। इसके जवाब में उन्होंने जो कहा था वह ध्यान देने लायक है। उन्होंने कहा कि ‘अगर हम केन्द्रीय सत्ता में गये तो नेतृत्व की हमारी सर्चाेच्च टीम रोजमर्रा की प्रशासनिक कवायदों से अपने को पूरी तरह अलग रखेगी। हम यानी शीर्ष नेतृत्व एक नीति तैयार कर सारी जिम्मेदारी दूसरी पीढ़ी को दे देंगे और सत्ता संचालन का काम उसके जिम्मे सौंप देंगे। कहने का अर्थ यह है कि हम अपनी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व में से ही राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनायेंगे और खुद जनता के संघर्षों के साथ अपने को जोड़े रखेंगे। क्रान्ति के क्रम में ही तो हम नेतृत्व में आये थे इसलिए जनता के साथ हमारा घनिष्ठ सम्बन्ध बना रहेगा। दूसरी पंक्ति के जिन लोगों को हम सत्ता संचालन का कार्य सौंपेंगे उन पर जनता की मदद से निगरानी रखने का काम भी हम कर पायेंगे। अगर सत्ता में बैठे व्यक्ति से गलती होती है तो हम जनता को उसके खिलाफ पूरी ताकत से मैदान में उतार देंगे––– यह काम चीन में माओ नहीं कर सके। हमें यह करना चाहिए और हम यह करके दिखायेंगे––– हम सत्ता में बैठे कामरेड से कहेंगे कि अगर तुमने थोड़ी भी गलती की तो हम लाखों–करोड़ों जनता को तुम्हारे विरुद्ध खड़ा कर देंगे और हममें यह क्षमता है–––’।

दो वर्ष बाद ही अगस्त 2008 में प्रचंड ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और तब से लेकर अब तक कभी उन्होंने उन बातों का पालन नहीं किया जिसे सत्ता में आने के बाद करने का संकल्प लिया था।

जेन जी आन्दोलन के दौरान बगैर किसी अपवाद के सभी राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं के घरों पर आन्दोलनकारियों ने हमले किये और जबर्दस्त क्षति पहुँचायी। पूर्व प्रधानमंत्री और नेकपा (एमाले) के नेता झलनाथ खनाल के घर को जला दिया जिसमें उनकी बीमार पत्नी भी बुरी तरह झुलस गयीं। नेपाली कांग्रेस के कई बार रहे पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी को आन्दोलनकारियों ने बुरी तरह पीटा। औरों की बात तो छोड़ दें, आश्चर्य यह है कि जनता के रोष से प्रचंड भी नहीं बच सके। आखिर इन लोगों के प्रति इतनी नफरत की वजह क्या थी? इसके लिए केवल सेना या अमरीका या मुट्ठीभर राजावादियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस नफरत की जड़ें बहुत गहरी हैं।

आन्दोलन की आग ठंडी पड़ने के बाद जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो चुके इन नेताओं ने अपने को नये सिरे से संगठित करने का सिलसिला शुरू किया। उन्हें अभी यह समझ में नहीं आया कि जनता उनके नेतृत्व से ऊब चुकी है और उसे नया नेतृत्व चाहिए। कुछ ही दिन पहले प्रचंड के नेतृत्व वाले सीपीएन (माओवादी केन्द्र) की एक बड़ी बैठक हुई जिसका मकसद पार्टी को पुनर्गठित करना था। वैसे भी सितम्बर के उत्तरार्द्ध में पार्टी अध्यक्ष प्रचंड ने पार्टी की सर्वोच्च कमेटियों को भंग कर दिया था। उन्होंने कुछ ऐसी नीतियाँ लेने की घोषणा की जिनके जरिये जेन जी आन्दोलन के साथ खुद को जोड़ा जा सके।

इस बैठक में कई सदस्यों ने खुल कर प्रचंड की नीतियों का विरोध किया और कहा कि उन नीतियों की वजह से पार्टी लगातार जनता से कटती चली गयी। इनमें जनमुक्ति सेना के पूर्व कमांडर जनार्दन शर्मा (प्रभाकर) और राम कार्की पार्थ भी शामिल थे। इनका कहना था कि किसानों और मजदूरों के पक्ष में पार्टी का जब तक पुनर्गठन नहीं किया जाएगा, न तो पार्टी का विकास होगा और न पार्टी को जनता का वह विश्वास प्राप्त हो सकेगा जो जनयुद्ध के दशक में उसे मिला था।

केन्द्रीय समिति के कुछ सदस्यों ने उन अनियमितताओं की जाँच की माँग की जिनका सम्बन्ध जनमुक्ति सेना के मद में आये पैसों से था। दरअसल माओवादियों और नेपाल सरकार के बीच 2006 में सम्पन्न व्यापक शान्ति समझौते के बाद जनमुक्ति सेना के योद्धाओं के व्यवस्थापन का सवाल पैदा हुआ और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता को दोनों पक्षों की सहमति मिली। सेना व्यवस्थापन के लिए संयुक्त राष्ट्र मिशन (अनमिन) ने 19,602 योद्धाओं की सूची तैयार की। केन्द्रीय समिति के सदस्य लक्ष्मण दत्त पन्त ने इस अधिवेशन में जो पर्चा प्रस्तुत किया उसके अनुसार इन योद्धाओं को प्रतिमाह मिलने वाले पैसों में से बड़े पैमाने पर धनराशि का घोटाला किया गया। बताया जाता है कि पीएलए के जवानों को मिलने वाले वेतन से प्रतिमाह 2000 रुपये और वेतन वृद्धि के बाद बढ़ी हुई राशि से ‘पीएलए फंड’ के नाम पर पैसा लिया जाता था। पन्त के अनुसार 6 वर्षों की अवधि में यह राशि 2–82 बिलियन हो जाती है जिसका हिसाब कभी नहीं दिया गया। यह राशि पार्टी के लिए खर्च हुई या पार्टी के प्रमुख नेताओं की जेबों में गयी, कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

ध्यान देने की बात है कि अनमिन ने 19,602 योद्धाओं और 3475 हथियारों की पुष्टि की थी। बाद में प्रचंड ने खुद शक्तिखोर के एक कैम्प में प्रशिक्षण के दौरान बताया था कि योद्धाओं की संख्या बढ़ाकर बतायी गयी थी। पन्त का कहना है कि इससे वित्तीय दुरुपयोगिता का सन्देह होता है।

पन्त ने 2008 का एक उदाहरण देते हुए कहा कि तत्कालीन संचार मंत्री कृष्ण बहादुर महरा ने ‘हेलो नेपाल टेलीकॉम’ के मालिक अजय सुमार्गी से लाइसेंस और नवीकरण शुल्क के रूप में महज 49–5 लाख रुपये लिये जबकि ‘नेपाल टेलीकॉम’ और ‘एनसेल’ जैसे अन्य टेलीकॉम आपरेटरों से 20 बिलियन की दर से पैसे वसूले। पन्त का कहना है कि मंत्री महोदय के इस निर्णय से अजय सुमार्गी को लगभग 20 बिलियन का लाभ पहुँचा। पन्त का यह भी कहना है कि पिछले 18 वर्षों के दौरान माओवादियों के पास हमेशा महत्वपूर्ण मंत्रालय रहे मसलन प्रधानमंत्री पद, वित्त, गृह, ऊर्जा, भौतिक अधिरचना, वन आदि। उन्होंने माँग की कि इस अवधि के दौरान राजनीतिक नियुक्तियों, लाइसेंसों, ठेकों, पदोन्नतियों और तबादलों के जरिये इन्होंने जो लाभ कमाए हैं उनकी गहन जाँच होनी चाहिए।

इसके जवाब में अध्यक्ष प्रचंड ने ऐलान किया कि पार्टी के स्तर पर एक आयोग का गठन किया जायेगा जो नेताओं की परिसम्पत्तियों की जाँच करेगा और उन्हें सार्वजनिक करेगा।

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जनता का विश्वास खोने की चूक कहाँ से हुई? क्या वजह है कि उसी जनता ने, जिसने 10 वर्षों के जनयुद्ध के दौरान माओवादियों का साथ दिया और 250 साल पुराने राजतंत्र को उखाड़ फेंका, अपने नेताओं की जान बचाने का कोई प्रयास नहीं किया? क्या प्रचंड जैसे लोगों को भी राज्य और राज्य की सेना के रहमोकरम पर जीवन बचाना पड़ा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनपर माओवादी नेतृत्व को गम्भीरता से विचार करना चाहिए था और आत्मालोचना का सहारा लेना चाहिए था। लेकिन इसने ऐसा करने के बजाय जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए नये–नये तरीके ढूँढने शुरू कर दिये।

5 नवम्बर को कम्युनिस्ट एकता के नाम पर एक नये संगठन नेकपा (समाजवादी) का गठन किया गया है। इसके मुख्य कोआर्डिनेटर प्रचंड और सहकोआर्डिनेटर माधव नेपाल बनाए गये हैं। अब से 50 वर्ष पूर्व नेपाल बैंक की नौकरी छोड़कर माधव नेपाल ने कम्युनिस्ट राजनीति को अपनाया था। वह सीपीएन (एमएल) में शामिल हुए और 16 मई 1993 को महासचिव मदन भंडारी की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के बाद पार्टी के महासचिव बने। लगभग डेढ़ दशक तक वह इस पद पर बने रहे। 2008 में संविधान सभा के लिए चुनावों में एमाले की शर्मनाक पराजय के बाद माधव नेपाल ने इस पद से इस्तीफा दे दिया। इस चुनाव में खुद माधव नेपाल भी अपने दोनों संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों काठमाण्डो और रौतहट से पराजित हुए।

प्रधानमंत्री पद पर रहने के बावजूद माधव नेपाल पर भ्रष्टाचार का कोई गम्भीर आरोप नहीं है– सिवाय बाबा रामदेव की कम्पनी पतंजलि को गैर कानूनी ढंग से जमीन देने के। नेपाल की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी सीआईएए (कमीशन आफ इंक्यायरी इन टु एव्यूज ऑफ अथॉरिटी) ने नेपाल की विशेष अदालत में जून 2025 में एक मामला दर्ज किया जिसमें जुर्माने के तौर पर माधव नेपाल से 35 लाख रुपये वसूले गये। उसका कहना था कि जिन दिनों माधव नेपाल प्रधानमंत्री थे उन्हीं दिनों 1 फरवरी 2010 को उनके मंत्रिमंडल ने जमीन हदबन्दी कानून की अवहेलना करते हुए पतंजलि को बनेपा में 815 रोपनी (1 रोपनी बराबर 0–0509 हेक्टेयर) जमीन दी। इसी मंत्रिमंडल ने 75 बीघा जमीन डांग में, 300 रोपनी लाम्जुंग में, 250 रोपनी स्यांगजा में, 15 बीघा चितवन में, 25 बीघा धनुषा में, 150 रोपनी काठमाण्डो घाटी में और 40 बीघा बारा–परसा क्षेत्र में 5 वर्षों के अन्दर खरीदने की अनुमति दी। जमीन खरीदने के तीन दिन बाद ही पतंजलि ने ऊँचे दाम पर इसे बेच दिया। इससे सरकारी राजस्व को काफी घाटा हुआ।

बहरहाल, अब वह प्रचंड के साथ नयी पार्टी में हैं। इनके दूसरे साथी झलनाथ खनाल लगातार इस नयी एकता का विरोध करते रहे लेकिन अब वह भी साथ हैं। प्रकाशित खबरों के अनुसार खनाल ने सवाल उठाया था कि आखिर 4 वर्ष पहले हमने एमाले से विद्रोह क्यों किया? क्या हमारा उद्देश्य पूरा हुआ? अगर उद्देश्य पूरा हुआ तो हमारा विद्रोह उचित था लेकिन अगर पूरा नहीं हुआ तो इस एकीकरण की जल्दबाजी क्या है? उन्होंने कहा कि केन्द्रीय समिति को इस बात का खुलासा करना चाहिए कि विद्रोह के बाद हम कहाँ पहुँचे।

इतना ही नहीं, ‘नेपाल न्यूज’ में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार 1 नवम्बर को आयोजित बैठक में खनाल ने माधव नेपाल पर आरोप लगाया कि वह ‘विघटनकारी’ की भूमिका निभा रहे हैं। उनके इस वक्तव्य से हाल में मौजूद श्रोताओं में खलबली मच गयी। उन्होंने बैठक का यह कहते हुए बहिष्कार किया कि उनके माइक की बिजली काट दी गयी और माधव नेपाल ने ऐसा करके तानाशाह जैसा व्यवहार किया है। उन्होंने यह भी कहा कि माधव नेपाल की यात्रा विद्रोही से विघटनकारी तक की पूरी हो गयी।

लेकिन दो दिन बाद ही वह प्रचंड और माधव नेपाल के बाद नेतृत्व में तीसरा स्थान हासिल करते हुए इस नयी पार्टी में शामिल हो गये।

जनयुद्ध के दिनों के एक पूर्व कमांडर गोपाल किराती भी इस नयी पार्टी में शामिल हुए हैं। 2017 में चुनाव से पहले वह प्रचंड से इसलिए अलग हो गये थे कि उन्होंने क्यों एमाले और बाबूराम भट्टराई की नवगठित पार्टी ‘नया शक्ति’ से चुनावी तालमेल किया।

एक दूसरे दिग्गज नेता बामदेव गौतम का भी एक पार्टी से दूसरी, दूसरी से तीसरी और तीसरी से चैथी तक की अनन्त यात्रा का लम्बा इतिहास है। 2020 में भी कभी केपी ओली तो कभी माधव नेपाल और फिर प्रचंड अपनी धुन पर इन्हें नचाते रहे और दबंग छवि के बावजूद यह नाचने को तैयार होते रहे। अन्तत: वह भी इस नये गठबन्धन में शामिल हो गये हैं। कहने का मतलब यह कि इस मिलन का कोई वैचारिक आधार नहीं है–– सबके अपने निजी स्वार्थ हैं। जिनके निजी स्वार्थ नहीं हैं वे ढलती उम्र और विकल्पहीनता की स्थिति से बेचैन हैं।    

जो शामिल नहीं हुए हैं वे हैं नेकपा (एकीकृत समाजवादी) के महासचिव घनश्याम भुसाल, माओवादी केन्द्र के प्रभाकर और राम कार्की पार्थ, नेकपा के नेत्र विक्रम चन्द बिप्लव जैसे लोग जो इन दिनों माओवादियों का दुष्प्रचार झेलने के लिए अभिशप्त हैं। इन लोगों ने एक अभियान शुरू किया है जिसका मकसद लोगों की क्रान्तिकारी चेतना को बनाये रखना और मार्क्सवाद–लेनिनवाद में आस्था को मजबूत करना है। धनश्याम भुसाल की निश्चित तौर पर यह धारणा है कि जब तक प्रचंड, माधव नेपाल, झलनाथ खनाल जैसे पहली पंक्ति के नेता अवकाश ग्रहण कर अपने बाद की पीढ़ी को नेतृत्व नहीं देंगे, पार्टी कुछ नहीं कर सकती। इनका समूचा इतिहास सत्ता में आने के बाद निजी और निहित स्वार्थों को पूरा करने का इतिहास है।

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 ऊपर नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य का जो मैंने वर्णन किया वह सचमुच बहुत निराशाजनक है। है न? नेपाल में पहली कम्युनिस्ट सरकार कामरेड मनमोहन अधिकारी के नेतृत्व में 1991 में बनी थी। 2008 में माओवादियों के नेतृत्व में पहली बार सरकार बनी। लेकिन हासिल क्या हुआ? क्या आपको ऐसा लगता है कि यह कम्युनिस्ट राजनीति की सहज अन्तर्निहित खामी है? फिर तो कोई रास्ता ही नहीं बचेगा। आज जब भारत सहित सारी दुनिया में फासिस्ट और तानाशाह प्रवृत्तियाँ एक बार फिर सिर उठाने लगी हैं– बल्कि उठा चुकी हैं, ऐसे में इन प्रवृत्तियों का सामना करने की ताकत किसके पास है? इन प्रवृत्तियों के साथ एक विचारधारा जुड़ी हुई है जो पूँजीवाद को निरन्तर मजबूत बनाने का काम करती है। इतिहास ने बार–बार साबित किया है कि इन प्रवृत्तियों का मुकाबला केवल और केवल कम्युनिस्ट ही कर सकते हैं क्योंकि उनके पास एक ऐसी विचारधारा है जो पूँजीवाद को परास्त कर दे। फिर निराशा क्यों? जरूरी है कि हम उन कारणों की शिनाख्त करें जिनकी वजह से तमाम ईमानदार कम्युनिस्ट नेताओं के बावजूद भारत में तानाशाह प्रवृत्तियों ने अपने पैर जमा लिये। अब फासिस्टों के लिए भी मैदान खुल चुका है जहाँ आरएसएस और भाजपा अपनी गोटियाँ बैठाने में लगे हैं।

इन सारे दुखद प्रकरणों के बीच कुछ ऐसी घटनाएँ भी सामने आ रही हैं जिनसे उम्मीद जिन्दा रहती है। 2 नवम्बर 2025 को ‘अन्नपूर्णा एक्सप्रेस’ में प्रकाशित प्रतीक घिमिरे की एक रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर के मध्य में युवा माओवादी कार्यकर्ताओं ने एक नये ‘जेन जी रेड फोर्स’ के गठन की घोषणा की जिसके जरिये घोषित लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए पार्टी पर दबाव डाला जा सके। इस ग्रुप का नेतृत्व अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संगठन (क्रान्तिकारी) की केन्द्रीय समिति की सदस्य स्मृति तिमलसिना कर रही हैं। संगठन ने देश के कई जिलों में कोआर्डिनेटरों की नियुक्ति की है। जेन जी रेड फोर्स ने संकल्प किया है कि वह भ्रष्टाचार को समाप्त कर और नये नेतृत्व को प्रोत्साहन देकर उन नेताओं से पार्टी को बचायेगा जिनका वर्षों से पार्टी पर प्रभुत्व रहा है। इसने सभी माओवादी नेताओं की परिसम्पत्तियों की जाँच की माँग उठायी है और सुझाव दिया है कि प्रचंड जैसे सर्वाेच्च नेता अपने पद पर बने रहने के लिए महज एक और कार्यकाल का लाभ उठायें।

दरअसल, हम तकरीबन डेढ़ सौ साल पहले घटित महत्वपूर्ण परिघटना पेरिस कम्यून को भूल जाते हैं। इतिहास बार–बार हमें पेरिस कम्यून की याद दिलाता रहता है– कभी इंडोनेशिया में तो कभी चिली में, कभी तेलंगाना में, तो कभी नेपाल में। हम हैं जो उसे देखने से इकार करते हैं और आँखें मूँद लेते हैं। इसकी वजह यह है कि पेरिस कम्यून के आदर्शों का पालन करने के लिए कठिन संघर्ष से गुजरना पड़ता है। नेपाल में प्रचंड को अच्छी तरह पता है कि सही रास्ता क्या है क्योंकि उस रास्ते पर चलते हुए ही वह राजतंत्र को समाप्त कर सके। आज उन्हीं आदर्शों की वह तिलांजलि दे रहे हैं। अपने खुद के इतिहास के साथ छल कर रहे हैं। यहाँ मुझे एक बार फिर रसूल हमजातोव के उस उद्धरण को दोहराना होगा कि ‘अगर तुम अतीत पर पिस्तौल तानोगे तो भविष्य तुम्हारी तरफ तोप के गोले दागेगा’। प्रचंड शायद इस कथन को भूल चुके हैं।

पेरिस कम्यून के सबक क्या थे? इस पर आप सब सोचें। अगले अंक में मैं भी इस पर प्रकाश डालने की कोशिश करूँगा।

 

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