अमरीका में मन्दी की आहट
–– कुलदीप
2008 में हाउसिंग बुलबुला फूटने से पैदा हुई महामन्दी का जख्म अब नासूर बन गया है। इसने अमरीकी अर्थव्यवस्था को चारों खाने चित कर दिया और उन अर्थव्यवस्थाओं को भी नहीं बख्शा जो प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप से अमरीकी अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई थीं और हैं। वैश्वीकरण के बाद आर्थिक रूप से एकीकृत दुनिया पर इसका प्रभाव पड़ना लाजिमी था। 2008 से आज तक पूरी दुनिया इस विकराल और विनाशकारी संकट में फँसी हुई है। इस संकट ने उस समय अरबों–खरबों की सम्पत्ति को रातों–रात स्वाहा कर दिया था। लाखों लोगों की कमाई शेयर बाजार में डूब गयी थी, छोटे–बड़े कल–कारखाने ठप्प हो गये थे और रोजी–रोजगार से हाथ धोना पड़ा था।
उस समय मन्दी के चलते अमरीका में 26 लाख लोगों का रोजगार छिन गया था और स्पेन में 30 लाख लोग बेरोजगार हो गये थे। अमरीकी माँग पर टिके कपड़ा उद्योग के 12 लाख, हीरे–जवाहरात उद्योग के 13 लाख और लेह्मन ब्रदर्स बैंक के 25 हजार कर्मचारियों (जिनमें 2300 भारत में कार्यरत थे) की नौकरी खत्म हो गयी थी। इस मन्दी से उबरने के लिए अमरीकी सरकार ने तुरन्त ही बैंकों में 1500 अरब डॉलर झोंक दिये थे और कुल मिलाकर 5100 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ अमरीकी जनता पर पड़ा था, जो उस समय भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5 गुना था। इस संकट ने कई लोगों को आत्महत्या की ओर धकेल दिया, इसके अलावा उनके लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ा था। अमरीकी संस्था ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ के अनुसार साल 2008–09 के आर्थिक संकट के चलते 56,658 लोगों ने आत्महत्या की थी।
2008 की महामन्दी पहली और आखिरी मन्दी नहीं थी। इससे पहले 1929 में भी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था ने कुख्यात महामन्दी को जन्म दिया था जो 1939 तक दुनिया के ऊपर भूतिया साये की तरह मण्डराती रही थी। इस मन्दी से बाहर निकलने के लिए साम्राज्यवादियों ने दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की आग में झोंक दिया था। महामन्दी कभी खत्म नहीं हुई थी बल्कि विश्व युद्ध में तिरोहित हो गयी थी। इसके बाद गृह युद्धों और शीत युद्धों ने पूँजीवाद को गति देना जारी रखा। लेकिन इस व्यवस्था के पास इस संकट का कोई समाधान नहीं था, 1970 तक आते–आते अमरीकी अर्थव्यवस्था फिर संकट में घिर गयी।
तब से हर आर्थिक चक्र के बाद मन्दी का संकट और ज्यादा गहराता गया, जो पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है। इसके लक्षण अमरीकी अर्थव्यवस्था में अब दिखायी देने लगे हैं। अमरीकी सरकार के आँकड़े और मुख्यधारा के मीडिया, न्यूज चैनल, पत्र–पत्रिकाएँ इसी ओर इशारा कर रही हैं कि अमरीका में मन्दी का संकट सिर पर सवार है। यहाँ तक कि राष्ट्रपति चुनाव की बहस में पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन ने खुद स्वीकारा कि अमरीकी अर्थव्यवस्था भयानक मन्दी की चपेट में है। ट्रम्प ने तो साफ बोला कि दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर जा रही है। 30 अगस्त 2024 को फॉर्ब्स की रिपोर्ट में सामने आया कि 2025 में अमरीका सहित पूरी दुनिया को भयानक मन्दी का सामना करना पड़ सकता है। खैर, विश्व युद्ध हो या न हो, लेकिन जमीनी हालात इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट में है और इसके लक्षण साफ नजर आ रहे हैं।
बढ़ती बेरोजगारी और छँटनी का आलम
अमरीका में अक्तूबर 2024 में बेरोजगारी दर 4–1 प्रतिशत थी और जुलाई 2024 में बेरोजगारी दर 4–3 प्रतिशत पर पहुँच गयी जो अक्तूबर 2021 के बाद से सबसे ज्यादा है। ‘आउटलुक’ में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार को उम्मीद थी कि जुलाई 2024 में कुल 1,75,000 लोगों को नौकरी देगी जबकि कुल 1,14,000 को ही नौकरी मिली जो उम्मीद से काफी कम है। बाकी 55,000 लोग बेरोजगारों की रिजर्व फोर्स में शामिल हो गये।
कोरोना महामारी के दौरान और उसके बाद अमरीका में तकनीकी क्षेत्र की कम्पनियों ने अपनी लागत को कम करने और मुनाफे को बरकरार रखने के लिए छँटनी प्रक्रिया शुरू कर दी थी। लेऑफ–डॉट–एफवाईआयी की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 में अब तक तकनीकी क्षेत्र की 384 कम्पनियों ने (इनमें 344 अमरीका की हैं) 1,24,000 से ज्यादा कर्मचारियों की छँटनी की और साल 2022–23 में 4,28,449 कर्मचारियों की छँटनी की थी। इनमें दुनिया की दिग्गज कम्पनियाँ–– माइक्रोसॉफ्ट, सिसको, इण्टेल, आयीबीएम शामिल हैं। ये कम्पनियाँ सस्ते श्रम की तलाश में आउटसोर्स के जरिये लातिन अमरीका, पूर्वी यूरोप, मध्यपूर्व, अफ्रीका और दक्षिण–पूर्वी एशिया के सस्ते कर्मचारियों से काम लेती हैं। ‘द बेलेंस’ में छपी एक रिपोर्ट में सामने आया है कि अमरीकी कम्पनियों ने 1–46 करोड़ कर्मचारियों को ऑउटसोर्स के जरिये रखा है। इसका सीधा असर अमरीकी जनता और अर्थव्यवस्था पर साफ–साफ दिखायी देने लगा है। रोजगार न होने कि वजह से लोग अपने रोजमर्रा के खर्चे में कटौती कर रहे हैं। अमरीका की जनता के सामने आय और खर्च का संकट आ खड़ा हुआ है, जिसका सीधा असर बाजार और अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है।
सेवा क्षेत्र संकट की गिरफत में
हाउसिंग बीमा कम्पनियों को भी मन्दी का भूत सताने लगा है। दरअसल, अमरीका में बहुत बड़े स्तर पर बीमा कम्पनियों का बाजार चलता है जो लोगों को तरह–तरह के डर दिखा कर अपनी बीमा पोलिसी बेचती हैं और फिर उस पैसे को शेयर बाजार में लगाती हैं। ऐसी ही एक हाउसिंग बीमा कम्पनी ‘डेल्टा टेरा कैपिटल’ के मालिक को इस बात की चिन्ता सताने लगी है कि रोजगार न होने की वजह से लोगों ने हाउसिंग बीमा कराना बन्द कर दिया है और इस साल उसे 28–7 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। इसका दुष्परिणाम कम्पनी में काम करनेवाले कर्मचारियों को ही झेलना पड़ेगा।
बेघर लोगों की संख्या में बढ़ोतरी
डीडब्ल्यू संस्था ने 2022 में प्रकाशित एक डॉक्यूमेण्टरी फिल्म में संकटग्रस्त अमरीकी व्यवस्था की भयावहता को और स्पष्ट रूप में उजागर किया था। साल 2022 में 4 करोड़ अमरीकी बेघर थे और गरीबी रेखा के नीचे गुजर–बसर करने पर मजबूर थे। इन बेघर लोगों में 15 लाख बच्चे थे। इन लोगों के पास एक समय रोजगार था, वे किराये पर या खुद के मकान में रहते थे, लेकिन नौकरी छूटने के चलते वे सभी सड़क–फुटपाथ या अपनी गाड़ियों में रहने के लिए मजबूर हो गये। मकान का किराया इतना ज्यादा है कि तनख्वाह का बड़ा हिस्सा इसी में चला जाता है और आय इतनी कम है कि लोगों को दवाई खर्च और भरपेट भोजन में से किसी एक को चुनना पड़ता है। किराया देने में 5 दिन की भी देरी हो जाये तो अमरीकी पुलिस के बन्दूकधारी तुरन्त बन्दूक की नोक पर किरायेदार से मकान खाली करा देते हैं। अमरीकी सरकार लोगों को रोजगार देने के बजाय हर महीने 4 करोड़ लोगों को फूड स्टैम्प (मुफ्त भोजन का कूपन) देती है जिस पर प्रति व्यक्ति 650 डॉलर (लगभग 55 हजार रुपये) खर्च आता है। फिर भी इन बेघर लोगों को भोजन और इलाज के लिए किसी एनजीओ, स्वयंसेवी संस्थाओं के भरोसे रहना पड़ रहा है या किसी बड़े रेस्तराँ और होटल की जूठन से अपना पेट भरना पड़ रहा है।
कृषि क्षेत्र में संकट
अमरीका का कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहा। अमरीका में एक किसान के पास कई सौ एकड़ जमीन होती है जिस पर वे खेती करते हैं। एक तरफ गलत मौद्रिक नीति लागू करने से डॉलर के मुकाबले वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे खेती का खर्च बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ रूस–यूक्रेन युद्ध के चलते डीजल, नाइट्रोजन, पोटेशियम (जो कभी सस्ते में उपलब्ध हो जाता था) महँगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है। खेती की बढ़ती लागत के चलते किसानों को बैंक से बड़ी मात्रा में कर्ज लेना पड़ रहा है जिसकी ब्याज दर महँगी है। खेती–किसानी उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है।
अमरीकी परिवार जो पीढ़ी–दर–पीढ़ी खेती कर रहे हैं, आज खेती–किसानी छोड़ने पर मजबूर हैं। कई परिवार ऐसे हैं जो खेती में संकट और अपनी आगे की पीढ़ी के भविष्य को देखते हुए, दूसरे धन्धों में लग गये हैं और वे अपने खेत बेचने पर मजबूर हैं या कर्ज न चुकाने की वजह से उनके खेत बैंक द्वारा कब्जा लिये गये हैं। 2017 से 2023 के दौरान 1–5 लाख छोटे किसानों ने खेती–किसानी छोड़ दी जबकि 2023 में कुल किसान 18–9 लाख थे।
ऐसा नहीं है कि सभी के लिए संकट है। यह व्यवस्था सभी के लिए एक जैसी नहीं है। एक तरफ दुनिया की बड़ी आबादी कंगाल होती जा रही है, अपनी जमीन से उजड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ मुट्ठीभर धन्नासेठ और अमीर होते जा रहे हैं। 2020 में दुनिया का सबसे अमीर आदमी ‘बिल गेट्स’ 2–69 लाख एकड़ खेती की जमीन (फार्म) का मालिक बन गया था।
गहराता संकट
आर्थिक संकट दिन–ब–दिन गहराता जा रहा है। उसकी मार से अमरीका के वे लोग भी अछूते नहीं हैं जो नौकरीपेशा हैं या जिनके छोटे–मोटे काम–धन्धे हैं। कुछ निश्चित आय के साथ ये अपने परिवार का गुजारा तो कर रहे हैं, लेकिन ये लोग भी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों (मुद्रास्फीति) के चलते अपने खर्चों में लगातार कटौती कर रहे हैं। ‘आयीबोट्टा’ के सर्वे में सामने आया है कि अमरीकियों को खर्चों में कटौती करने के बाद भी हर महीने 25 डॉलर (लगभग 2100 रुपये) ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। बाजार में माल भरे हुए हैं लेकिन कोई खरीदार नहीं है।
दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों की निगाहें अब अमरीकी अर्थव्यवस्था पर आ टिकी हैं और उनके बीच चर्चाओं का बाजार गर्म है। एक तरफ पूँजीवाद खेमे के साम्राज्यवादी नीतियाँ लागू करने वाले वे लोग हैं जो शेयर बाजार की उठा–पटक पर अपनी नजर गड़ाये रहते हैं और इसी के आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं। ये अर्थव्यवस्था को संकट से निकालने का सिर्फ एक ही तरीका लागू करते हैं और वह है, पूरी दुनिया में युद्ध की स्थिति बनी रहे और हथियारों की खरीद–फरोख्त जारी रहे। इजराइल–फिलिस्तीन और रूस–यूक्रेन युद्ध में अभी तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं। संकट और युद्धोन्माद का असर अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में साफ नजर आया। पहले सत्ता से ट्रम्प को हटाना और फिर जो बाइडन को हटाकर दुबारा उसे सत्ता में लाना इसी साम्राज्यवादी मन्सूबे का नतीजा है। साम्राज्यवादी बारी–बारी से अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी दोनों पार्टियों को आजमा रहे हैं। लेकिन संकट का कोढ़ नेता बदलने, युद्ध भड़काने या जनता पर संकट का बोझ लाद देने से सही नहीं होगा।
दरअसल, इस पूँजीवादी व्यवस्था में मन्दी का कोई समाधान है नहीं क्योंकि यह इस व्यवस्था की पुत्री है और पूँजीवाद के शुरुआत से ही इसके गर्भ में पल–बढ़ रही है। तब से हर आर्थिक चक्र के साथ यह और ज्यादा विकराल और विनाशकारी होती जा रही है। आज पूँजीवाद की यह विनाशकारी पुत्री पूरी तरह बेकाबू हो चुकी है। यह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ नालिनाभ जुड़ी हुई है। उसी से संजीवनी पाती है जिसके केन्द्र में सिर्फ मुनाफा होता। आज मुनाफा इनसानियत का सबसे बड़ी दुश्मन बन गया है। इसका समाधान सिर्फ एक ही है कि इसकी जगह एक नयी व्यवस्था कायम की जाये जो मुनाफा केन्द्रित नहीं, बल्कि इनसान केन्द्रित हो और जिसके केन्द्र में सबकी खुशहाली हो।
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