ट्रम्प जलवायु समझौते से भाग गया
21 मार्च 2025 भारत में इस सदी का सबसे गर्म दिन था। इस दिन दिल्ली में पारा 41–3 डिग्री सेंटीग्रेड और राजस्थान के बाड़मेर में 47 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुँच गया। यह भयावह हो चुके जलवायु संकट का एक लक्षण मात्र है। लेकिन ठीक इसी समय अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प अपनी तमाम पर्यावरणीय जिम्मेदारियों से मुकर गया और खुद को पेरिस जलवायु समझौते से बाहर कर लिया।
जलवायु संकट बढ़ाने में मानव गतिविधियों की भूमिका का पता लगाने और उन्हें रोकने जैसे मुद्दे शुरुआत से ही जलवायु सम्मेलनों में शामिल थे लेकिन रोकना तो दूर आज तक इनमें सुधार भी नहीं किया गया है। अब तक जलवायु सम्मेलनों की हालत ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ वाली ही बनी हुई है। पश्चिमी यूरोप, अमरीका, जापान जैसे अमीर और औद्योगिक क्रान्ति करने वाले देश जलवायु संकट के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार पाये गये थे। इन्हें अपने यहाँ कार्बन उत्सर्जन घटाने और गरीब देशों को हर्जाना देने के फैसले भी जलवायु सम्मेलनों में हुए थे, क्योंकि जलवायु संकट का सबसे ज्यादा नुकसान उन देशों को उठाना पड़ रहा है जिनकी इसमें सबसे कम भूमिका है। कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप) में इससे जुड़े हुए कई नियम–कानून बने लेकिन खासतौर पर अमरीका जैसे ताकतवर देशों ने उन्हें कभी ढ़ंग से लागू नहीं किया।
नतीजतन, कोई रोकथाम होने के बजाय जलवायु संकट हर रोज ज्यादा गम्भीर होता गया है। अगर अमीर देशों ने कार्बन उत्सर्जन कम करने के नियम लागू नहीं किये और सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि सन 2100 तक दुनिया के तापमान में 2–8 डिग्री सेंटीग्रेड तक की बढ़ोतरी हो जाएगी जिसके विनाशकारी परिणामों का अन्दाज लगाना भी मुश्किल है, क्योंकि महज 1–5 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ़ने पर ही पशु–पक्षियों की कई नस्लें खत्म हो जाएँगी, एक करोड़ लोग बाढ़ की चपेट में आ जाएँगे। इससे समुद्र के जलस्तर में होने वाली बढ़ोतरी से तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले करोडों लोग उजड़नेपर मजबूर होंगे।
आस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के वैज्ञानिकों ने अनुमान लागया है कि इस सदी के अन्त तक धरती का तापमान 4 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ जाएगा जिससे दुनिया के कुल उत्पादन में 40 फीसद तक की गिरावट आएगी। पर्यावरण को पहले ही इतना ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा चुका है कि अगर दुनिया के शासक प्रकृति के बेलगाम दोहन की व्यवस्था को रोककर पर्यावरण के प्रति अपनी पूरी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को आज ही हासिल कर लें तो भी धरती के तापमान में 9 डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोतरी होगी।
1979 के बाद से ही विकसित देश, खासकर अमरीका अपनी पर्यावरण सम्बन्धी जिम्मेदारियों से बचते आ रहे हैं। शुरू में तो ये इस संकाट को स्वीकार ही नहीं करते थे। जब मान लिया तो उसकी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हुए। जब तैयार हुए तो इसमें भी कार्बन क्रेडिट जैसा मक्कारी भरा तिजारती तरीका निकाल लिया। इसके तहत वे अपने देश में कार्बन उत्सर्जन कम करने के बजाय विकासशील देशों में उत्पादक गतिविधियों पर रोक लगवाकर वहाँ कार्बन उत्सर्जन को कम करवाते हैं और इसके बदले में उन्हें कुछ रुपये देते हैं। इसे भी वे विकासशील देशों को परनिर्भर बनाकर कई गुना वापस ले लेते है। अब अमरीका को यह भी मंजूर नहीं है।
यह सच है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बने अन्तरराष्ट्रीय संगठन बहुत कारगर नहीं रहे हैं और इनमें तीन–तिकड़म ही ज्यादा चली है, लेकिन कुछ भी नहीं होने से तो यह बेहतर ही है। 2015 में हुए पेरिस समझौते में कार्बन उत्सर्जन को शून्य तक लाना और वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे रखने की सहमति बनी थी। इसमें 200 देश भागीदार थे। लेकिन अब ट्रम्प ने इससे पल्ला झाड़कर इसकी अहमीयत खत्म कर दी है। यानी अमरीका धरती को गर्म करने वाली गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करेगा, धरती का नाश करने में सबसे आगे रहेगा, लेकिन यह धरती कम से कम जीने लायक बची रहे, इसके लिए कोई योगदान नहीं देगा।
ट्रम्प जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग को वैज्ञानिकों की मनगढ़न्त बात कहता है। अपनी जलवायु सम्बन्धी जिम्मेदारी से भागकर वह उस पेड़ को ही काट रहा है जिस पर सारी दुनिया बैठी है। ट्रम्प तो पूरी मानवता के खिलाफ अपराध कर ही रहा है लेकिन उन देशों के शासकों को क्या कहा जाये जो पेरिस समझौते में शामिल हैं और ट्रम्प का कोई विरोध नहीं कर रहे हैं। वास्तव में वे सब ट्रम्प के अपराध के सहभागी हैं। क्या हम ऐसे शासकों के भरोसे अपनी धरती को बर्बाद होने के लिए छोड़ सकते हैं?
ट्रम्प के ही देश में मानवता के खिलाफ उसके अपराध के विरोध में लाखों लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और ट्रम्प को मूक समर्थन दे रहे उसके सहअपराधी, बाकी देशों के शासकों के खिलाफ जनआन्दोलन तैयार करने चाहिए। ये खुद को कुदरत से भी ऊपर, खुदा मानते हैं। इनके और इनकी बनायी प्रकृति विरोधी व्यवस्था के विनाश से ही पर्यावरण के विनाश पर रोक लग सकती है।
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