शिक्षकों की स्वतंत्रता का भ्रम
भारतीय समाज में शिक्षक का स्थान केवल पेशेवर की भूमिका तक सीमित नहीं रहा है। शिक्षक को समाज में बौद्धिक, नैतिक, संस्कृतिक परम्परा का वाहक माना जाता है। प्राचीन गुरुकुल से लेकर आधुनिक स्कूल तक समाज निर्माण में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को हम सभी स्वीकार करते हंै। लेकिन आज देश की शिक्षा को बाजार के हवाले कर दिया गया है जिसके बुरे नतीजे हमारे सामने हैं। आज निजी क्षेत्र में स्कूल की संख्या बढ़ने के साथ ही शिक्षकांे की गरिमा और स्वतंत्रता गहरे संकट में है। इन स्कूलों के शिक्षक देखने में स्वतंत्र है पर वास्तव में वे असुरक्षा, नियंत्रण और बाजार के मकड़–जाल में फँसे हुए हैं।
निजी स्कूलों की चमकदार इमारतंे, अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा, स्मार्ट क्लास, डिजिटल तकनीक और अनुशासित वातावरण ऐसा माहौल बनाते हंै जिसमें शिक्षक स्वतंत्र और सृजनशील दिखते हंै। सरकारी स्कूलों की तुलना में यहाँ अधिकारियों का दबाव कम दिखता है और माना जाता है कि निजी स्कूलों के शिक्षक अपनी शिक्षण–शैली और पद्धति को स्वतंत्र रूप से विकसित कर सकते हैं। लेकिन यह किताबी धारणा जमीनी हालात से मेल नहीं खाती। निजी स्कूल का पाठ्यक्रम तो बोर्ड तय करता है, लेकिन उसे कैसे पढ़ाया जाये, कितनी गति से पढ़ाया जाये, कौन से उदाहरणों का उपयोग किया जाये–– यह सब स्कूल प्रबन्धन सीधे या परोक्ष रूप से तय करता है। शिक्षक की रचनात्मकता और स्वतंत्रता को प्रबन्धन तभी तक स्वीकार करता है जब तक शिक्षक उनके द्वारा निर्धारित दायरे में रहे, छात्रों के एडमिशन में अपनी भूमिका निभाये और बाजार में स्कूल की छवि को चमकाये।
निजी स्कूलों में शिक्षक अस्थायी या अनुबन्ध आधारित नियुक्तियों पर काम करता है। उसके पास न तो स्थायी सेवा की गारण्टी होती है और न ही वेतन, पदोन्नति, आदि का कोई स्पष्ट ढाँचा। असुरक्षा की स्थिति में शिक्षक के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में आलोचनात्मक और स्वतंत्र विचार का कोई महत्व नहीं, बल्कि वह प्रबन्धन की पसन्द–नापसन्द और दबाव में काम करता है। शोषण, अन्याय और आजादी के संघर्ष के बारे में शिक्षक पढ़ा तो सकता है, लेकिन वह अपने शोषण, अन्याय और संघर्ष पर मौन रहता है। असली समस्याएँ यहीं से शुरू होती हैं।
निजी स्कूलों में सुरक्षा के नाम पर लगातार निगरानी करते कैमरे, फीडबैक सिस्टम और कोर्स पूरा करने का दबाव–– शिक्षक को गुलामी का एहसास कराते हैं। ऊपर से अभिवावकों की शिकायतंे, प्रिंसिपल का निरीक्षण और छात्रों द्वारा उसकी रेटिंग–– उसकी स्वतंत्रता का हनन करके उसके दुखों को बढ़ा देते हैं। अब शिक्षक का पेशा पढ़ाना नहीं, बल्कि इन सभी को खुश रखना रह जाता है। शिक्षक जनता है कि एक शिकायत, एक असहमति या नकारात्मक टिपण्णी और उसकी सेवा समाप्त। इस डर में जीना किसी स्वतंत्रता का एहसास नहीं कराता।
इनता ही नहीं वे सबसे कम वेतन वाले मजदूर ही हैं। ऊँची डिग्री, शिक्षण प्रमाणपत्र और वर्षों के अनुभव के बाबजूद मात्र 8–10 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन जो उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहद कम है। बढ़ती बेरोजगारी के चलते नौजवानों को जब दूसरा रोजगार नहीं मिलता तो वे शिक्षण कार्य में आ जाते हंै जिसका फायदा उठाकर प्रबन्धक अनुभवी शिक्षकों को निकाल बाहर कर उनकी जगह नये शिक्षकों की भर्ती करते हैं। उनका वर्षों का अनुभव नौकरी के लिए खतरा बन जाता है। दूसरे क्षेत्र में अनुभव के आधार पर पदोन्नत्ति मिलती है, लेकिन शिक्षकांे को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता कब तक बरकरार रहेगी।
शिक्षण कार्य के साथ अतिरिक्त जिम्मेदारियों का बोझ अलग से। हर साल एडमिशन के लिए घर–घर धक्के खाना, फीस उगाही के लिए प्रिंसिपल से अपमानित होना, समय से फीस न आये तो वेतन रोक दिया जाना, समय पर स्कूल न पहुँचे तो आर्थिक दण्ड, लेकिन अतिरिक्त काम के लिए अलग से भुगतान नहीं। कक्षाओं में कुर्सी नहीं, लगातार खड़े होकर पढ़ाना पड़ता है। इसका सीधा असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ता है। अगर कोई शिक्षक छात्र की शीट पर बैठ जाये तो उसे मीटिंग में अपमानित किया जाता है।
निजी स्कूलों में महिला शिक्षकों की भागीदारी अधिक है जिन्हें मातृत्व अवकाश नहीं दिया जाता, माँ बनने की स्थिति में नौकरी छोड़नी पड़ती है। अगर कोई शिक्षक इनके खिलाफ अपनी आवाज उठाता है तो उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है जिससे दूसरे शिक्षण संस्थान में काम मिलना मुश्किल हो जाता है।
ऐसे माहौल में रचनात्मकता कैसे बचेगी? जब शिक्षक को हर समय सोचना पड़े, वह क्या कर रहा है, कैसे कर रहा है और किसको नाराज कर सकता है, तो शिक्षक सुरक्षित रास्ता चुनता है। वह वही पढ़ाता है जो परीक्षा में रिजल्ट दे। वह किताबी ज्ञान देता है, लेकिन छात्रों को सवाल पूछना नहीं सिखाता। वह पढ़ना सिखाता है, लेकिन चुनौती स्वीकार करना नहीं सिखाता। वह मशीन का ऐसा पुर्जा है जो अपने जैसे पुर्जे को तैयार करता है। यानी तोता रटन्त शिक्षा जिसे देखकर यही बात याद आती है–– “अन्धा गुरू बधिर शिष होई/एक न देखै सुनै नहीं कोई।”
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