अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

राष्ट्र–राज्य की नियति

राष्ट्र–राज्य क्या है और उसकी ऐतिहासिक विकास यात्रा किन रास्तों से आगे बढ़ी?

मध्य युग के इतिहास की अंधेरी सुरंग से सामन्ती व्यवस्था की जर्जर गाड़ी जब चरमराती हुई बाहर निकल रही थी, उसी वक्त पूँजीवादी उत्पादन की तेज रौशनी ने उसे चैंका दिया था–– एक ऐसी रौशनी जो अब केवल सामन्तों–जमीन्दारों के खेत–खलिहानों में नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों की भट्ठियों, व्यापारिक जहाजों और बैंक के रूखे कागजों में चमकने लगी थी। उत्पादन के साधन अब खेतों की मिट्टी से उठकर धुआँ उगलती चिमनियों और मशीनों के घूमते पुर्जों में तब्दील हो चुके थे और जैसे–जैसे यह लोहे की कविता गढ़ी जा रही थी, पूँजी ने एक नया राग अलापा–– एक ऐसा राग, जो उसके सुर में गा सके, उसकी लय पर चल सके। यहीं से राष्ट्र–राज्य उस वायलिन की तरह बजने लगा, जिसे पूँजीवाद ने अपने अनुसार सुर प्रदान  कर दिया।

यह राष्ट्र–राज्य कोई भोला चरवाहा नहीं था, जो नागरिकों की हिफाजत करेय बल्कि यह एक चैकस दरबान था, जो अपने द्वार के बाहर खड़ा पूँजी की चैखट की निगरानी करता था–– बाजार की खिड़की से आने वाले हर निवेश की राह साफ करता और उन दरारों को बन्द करता जहाँ से श्रमिक असहमति की जलती लपटें अन्दर आ सकती थीं। जहाँ सामन्ती राजसत्ता सीमेण्ट–र्इंट से बना किला थी, वहीं पूँजीवादी राष्ट्र–राज्य बाजार के लिए बनी किलेबन्दी–– सीमेण्ट–र्इंट की नहींय कानूनों, अनुबन्धों और राष्ट्रीय सीमाओं से बनी हुई। यह एक ऐसा किला है जो बाहर से लोकतांत्रिक दिखता है–– झण्डे की छाया में खड़ा, संविधान की इमारत में रंगा हुआ–– लेकिन भीतर उसकी नींव में वही पूँजी का अट्टहास गूँजता है, जो कहती है–– स्वतंत्रता तुम्हारी नहीं, तुम्हारी क्रय–शक्ति की है।

जैसे–जैसे बाजार फैलता गया, यह राष्ट्र–राज्य उस नक्शे में बदल गया जिस पर लाल रेखाएँ खिंचने लगीं–– बॉर्डर के नाम पर, ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर। लेकिन इन रेखाओं के पीछे असली खेल यह था कि कौन किस बाजार पर कब्जा करेगा, किस जमीन से खनिज निकलेगा और किस नदी का पानी फैक्ट्री के टैंक में बहेगा। इस तरह राष्ट्र–राज्य पूँजीवाद का राजनीतिक अवतार बना–– एक ऐसा अवतार जो न मंदिर में दिखता है, न संसद में–– बल्कि शेयर बाजार की स्क्रीन पर, कॉर्पोरेट लॉबी के गलियारों में, और पुलिस की वर्दी की चमक में अवतरित होता है।

इस पूरी प्रक्रिया में जनता? वह तो कभी झण्डे की डण्डी पर लटकती एक उम्मीद है, कभी राष्ट्रीय गीत की अधूरी पंक्ति और कभी उस भीड़ का हिस्सा जो ‘देशहित’ के नाम पर किसी प्रधानमंत्री के भाषण में ताली बजाकर ठगी जाती है–– जबकि उसी पल किसी मजदूर की हथेली से उसके हक का आखिरी सिक्का भी छीन लिया जाती है। यह है वह राष्ट्र–राज्य–– एक ऐसा मुखौटा, जो लोकतंत्र का चेहरा पहनकर पूँजी का ताण्डव नृत्य करता है और पीछे छूट जाते हैं वे लोग–– दीवारों पर उकेरी गयी आकृतियाँ बनकर–– जो कभी राजा की प्रजा थे, अब पूँजी के ग्राहक हैं और केवल रजिस्टर में दर्ज आँकड़े। राष्ट्र का ‘विकास’ दरअसल शहरी मध्यवर्ग और पूँजी के विस्तार का नाम बन जाता है, जबकि मेहनतकश जनता विस्थापन, गरीबी और राज्य दमन का शिकार होती है।

पूँजीवाद और राष्ट्र–राज्य का सम्बन्ध बेहद गहराई से जुड़ा हुआ है और ऐतिहासिक है। राष्ट्र–राज्य की आधुनिक परिकल्पना सामन्ती व्यवस्था के विघटन और पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के उभार के साथ विकसित हुई। जब उत्पादन के साधन निजी हाथों में केंद्रित होने लगे, व्यापार और बाजार का विस्तार हुआ, तब एकीकृत राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता महसूस हुई–– जो पूँजी के प्रवाह को सुविधाजनक बनाये, आन्तरिक स्थिरता सुनिश्चित करे और बाहरी प्रतियोगियों से रक्षा कर सके। यहीं से आधुनिक राष्ट्र–राज्य का जन्म होता है, जो पूँजीवाद का राजनीतिक रूप बनकर उभरता है।

राष्ट्र–राज्य एक वर्गीय यंत्र है–– वह किसी तटस्थ सत्ता का रूप नहीं, बल्कि एक विशेष वर्ग के हितों की रक्षा और अधीन वर्गों के दमन का औजार है। वह पूँजीपतियों के हित में ऐसी व्यवस्था निर्मित करता है, जहाँ ‘राष्ट्रीय एकता’ के नाम पर वर्ग–संघर्ष को दबाया जाता है और ‘देशभक्ति’ के नाम पर शोषण को वैधता दी जाती है। इस रूप में, वह पूँजी के वैश्विक विस्तार का औजार भी बन जाता है, जो कभी साम्राज्यवाद, कभी नव–उदारवाद और कभी सुरक्षा के नाम पर लुटेरे युद्धों को जायज ठहराता है।

इतिहास में इस संरचना को औपनिवेशिक और नव–औपनिवेशिक सन्दर्भों में भी देखा गया है। खासकर, तीसरी दुनिया के देशों में राष्ट्र–राज्य न तो पूरी तरह स्वतंत्र थे और न अब हैं, न ही जनपक्षीय। यहाँ की सत्ता पूँजीवादी–सामन्ती गठजोड़ के हाथों में होती थी, जो विदेशी पूँजी के साथ मिलकर जनता का दोहरा शोषण करती थी।

आज के दौर में राष्ट्र–राज्य की स्थिति और भी जटिल हो गयी है। पूँजी अब वैश्विक है, मगर उसके लिए जरूरी ‘राष्ट्रीय राज्य’ अब भी सीमाओं का प्रहरी बना हुआ है। यह विरोधाभास है–– जहाँ एक ओर पूँजी सरहदें लाँघती है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्र–राज्य उन सरहदों को मजबूत करता है, ताकि अन्दरूनी असन्तोष को बाहरी दुश्मनों की ओर मोड़ा जा सके। यह ‘राष्ट्रवाद’ अब एक राजनीतिक ताकत बन गया है–– मजदूरों, किसानों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और वंचितों की माँगों को देशद्रोह करार देकर कुचलने की ताकत।

हमें इस स्थिति को वर्ग–संघर्ष के उभार के रूप में देखना चाहिए, जो एक नयी क्रान्ति की जमीन तैयार करता है। आज जब पूँजी का चरित्र और अधिक लोलुप, लम्पट, लोकतंत्रविहीन और हमलावर हो चला है, तब राष्ट्र–राज्य की भूमिका एक जनविरोधी दमनतंत्र की हो गयी है। उसका हर कदम–– चाहे वह ‘विकास’ के नाम पर भूमि अधिग्रहण हो, मजदूर आन्दोलन को अपराधी करार देता हो या ‘सुरक्षा’ के नाम पर जनजातीय इलाकों में सैन्य कार्रवाई–– असल में राष्ट्रहित के नाम पर पूँजी के हित में जनता के खिलाफ अनवरत युद्ध है।

इसलिए, राष्ट्र–राज्य का उभार पूँजीवाद की जरूरत थी और उसका मौजूदा स्वरूप पूँजीवाद की रक्षा की मशीनरी बन चुका है। इसका खण्डन सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक क्रान्तिकारी पुनर्संरचना के जरिये ही सम्भव है–– जहाँ राष्ट्र–राज्य को मेहनतकश जनता के हाथों में एक सामाजिक रूप से जनवादी सत्ता के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाये। यही वर्ग संघर्ष का निर्णायक क्षण होगा, जहाँ राष्ट्र सिर्फ एक भू–राजनीतिक सीमा नहीं, बल्कि मेहनतकश जनता की सत्ता बनेगा और अन्त में वर्गविहीन समाज की स्थिति में खुद–ब–खुद ध्वस्त हो जायेगा।

क्या आज पूरी दुनिया के कॉर्पोरेट मिलकर शासन कर रहे हैं या हर देश का पूँजीपति वर्ग राष्ट्र–राज्य के जरिये अपने–अपने देश पर शासन कर रहा है?

आज की पूँजीवादी व्यवस्था में शासन की प्रकृति काफी जटिल हो गयी है। यह कहना अधूरा होगा कि केवल किसी देश का पूँजीपति वर्ग ही राष्ट्र–राज्य के माध्यम से वहाँ शासन कर रहा है। यह कहना तो सच्चाई से कोसों दूर होगा कि वैश्विक कॉर्पोरेट पूँजी ही पूरी दुनिया पर सीधा शासन कर रही है। सच्चाई जटिल है –– आज स्थानीय पूँजीपति वर्ग और वैश्विक कॉर्पोरेट पूँजी एक–दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, परस्पर लाभ में हिस्सेदार हैं और बहुधा श्रमिक वर्ग के खिलाफ एक अपवित्र गठबन्धन बनाते हैं।

आज राष्ट्र–राज्य किसी विशिष्ट ‘राष्ट्र’ के नागरिकों की सम्प्रभु इच्छाओं का प्रतिनिधि नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा ढाँचा बन गया है, जो स्थानीय पूँजी के साथ–साथ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों की रक्षा भी करता है। यह पूँजी का राजनीतिक तंत्र है, जो असंख्य दुरम्भि–सन्धियों के जरिये अपने भीतर पूँजी के वैश्वीकरण और वित्तीय एकाधिकार को आत्मसात कर चुका है। नीति–निर्माण से लेकर कानून–प्रवर्तन तक, हर स्तर पर यह देखा जा सकता है कि कॉर्पोरेट हितों के मुताबिक नीतियाँ बनती हैं –– चाहे वह कृषि कानून हों, श्रम सुधार हों, पर्यावरणीय कायदे–कानून हों, या शिक्षा और स्वास्थ्य के निजीकरण के फैसले।

इसमें स्थानीय पूँजीपति वर्ग का विशेष स्थान बना रहता है। वह न केवल अपने राष्ट्रीय राज्य को नियंत्रित और संचालित करता है, बल्कि वैश्विक पूँजी के साथ गठजोड़ कर उसे यहाँ लाभदायक और सुविधा सम्पन्न ‘मार्केट एक्सेस’ देता है। इसके बदले में उसे अन्तरराष्ट्रीय पूँजी और तकनीकी संसाधनों की पहुँच मिलती है। इस तरह एक संयुक्त शासन तंत्र बनता है –– जिसमें नीति अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ तय करती हैं, लेकिन उसे लागू स्थानीय नौकरशाही और राजनीतिक तंत्र करता है।

इस शासन तंत्र की खास बात यह है कि यह प्रत्यक्ष अधिनायकवाद की जगह छद्म लोकतंत्र का उपयोग करता है। चुनाव होते हैं, पर चुनावी फंडिंग उन्हीं पूँजीपति घरानों से होती है जो नीतियों की दिशा पहले ही तय कर चुके होते हैं। इसीलिए दुनिया के अलग–अलग देशों में सरकारें बदलती हैं, पर जनता पर नीतियों की मार नहीं बदलतीं–– क्योंकि वास्तविक सत्ता आर्थिक ढाँचे में केन्द्रित है, न कि प्रतिनिधियों में।

यह पूँजीवाद का परिपक्व चरण है–– जहाँ राज्य अब वर्ग संघर्ष को कुचलने वाला ढाँचा और पूँजी का सक्रिय औजार है। और जब पूँजी की प्रकृति वैश्विक हो चुकी है, तो राज्य की नीतियाँ भी उसी वैश्विक पूँजी के अनुकूल ढाली जाती हैं। इस ढाँचे में, मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता को राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाकर संघर्ष को विकसित करना पड़ता है, क्योंकि उनके शोषणकर्ता अब सिर्फ ‘देश के भीतर’ नहीं, बल्कि एक बहुराष्ट्रीय तंत्र का हिस्सा हैं।

इसलिए, यह कहना अधिक यथार्थपरक होगा कि आज का शासन एक कॉर्पोरेट–राज्य सन्धि के रूप में कार्य कर रहा है–– जिसमें एक तरफ बहुराष्ट्रीय पूँजी की वैश्विक ताकत है और दूसरी तरफ राष्ट्र–राज्य की कानूनी, सैन्य, और संस्थागत मशीनरी। दोनों मिलकर एक ऐसी व्यवस्था चला रहे हैं, जो आम जनता के जीवन, अधिकारों और संसाधनों को मुनाफे के तराजू पर तौलती है। पूँजीवाद के रहते राष्ट्र–राज्य के अन्त की बातें बघारना जनता को गुमराह करने के लिए कही जाती हैं और पूँजीवादी दुष्प्रचार हैं।

राष्ट्र–राज्यों के बीच अन्तर्विरोध में टकराव और संश्रय के पहलुओं की नव उदारवादी दौर में क्या स्थिति है, खासकर साम्राज्यवादी देशों के बीच?

नव उदारवादी दौर में राष्ट्र–राज्यों के बीच अन्तर्विरोधों की प्रकृति जटिल, बहुआयामी और विरोधाभासी हो गयी है। विशेषकर साम्राज्यवादी देशों के बीच यह टकराव और संश्रय–– यानी संघर्ष और सहयोग एक साथ मौजूद रहते हैं।

जहाँ पूँजी की वैश्विक गति और मुक्त बाजार की अवधारणा ने साम्राज्यवादी राष्ट्रों को आपसी व्यापार, निवेश, तकनीकी सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में साझेदारी के लिए मजबूर किया है, वहीं पूँजी के असमान विकास और प्रभुत्व की उसी लालसा ने उनके बीच गहरे टकराव भी पैदा किये हैं। ये टकराव केवल सैन्य या राजनयिक नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और विचारधारात्मक क्षेत्रों में भी उभरते हैं। अमरीका और चीन के बीच तकनीकी वर्चस्व की लड़ाई, यूरोपीय संघ और अमरीका के बीच व्यापारिक नीति को लेकर मतभेद, रूस और पश्चिम के बीच भू–राजनीतिक संघर्ष–– ये सभी इस अन्तर्विरोध की जीवन्त मिसालें हैं।

नव उदारवाद के तहत, राष्ट्र–राज्य की भूमिका पिछली सदी की तुलना में बदल गयी है। अब वह न केवल अपने सीमाओं की रक्षा करने वाला संरक्षक है, बल्कि साम्राज्यवादी पूँजी के लिए ‘स्थानीय प्रतिनिधि’ की तरह भी काम करता है। इस भूमिका में वह एक तरफ साम्राज्यवादी पूँजी के दबाव में अपनी नीतियाँ ढालता है, दूसरी तरफ अपने ‘राष्ट्रीय हितों’ की रक्षा के नाम पर उसी पूँजी के वितरण, नियंत्रण और पहुँच को लेकर अन्य साम्राज्यवादी राष्ट्रों से टकराता भी है। इस प्रकार, नवउदारवादी वैश्वीकरण ने राष्ट्र–राज्यों को एक–दूसरे के साथ जोड़ भी दिया है और प्रतिस्पर्धा के मैदान में खड़ा भी कर दिया है।

साझा मंचों–– जैसे जी–7, जी–20, डब्ल्यूटीओ, आईएमएफ और यूएन में साम्राज्यवादी देशों का संश्रय अक्सर दिखता है, लेकिन वह सहयोग भी पूँजी की रक्षा, संसाधनों के बँटवारे और नये बाजारों की लूट को “नियंत्रित” करने के लिए होता है। वे एक–दूसरे से टकराते हैं, लेकिन पूरी व्यवस्था को ढहने नहीं देते क्योंकि वे सभी उसी नव–उदारवादी ढाँचे में बँधे हैं, जो वैश्विक पूँजी के ‘स्मूथ ऑपरेशन’ को प्राथमिकता देता है।

टकराव अब अधिकतर परम्परागत साम्राज्यवादी युद्धों के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय हमलोंय व्यापार, मुद्रा और साइबर युद्धों तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के नियंत्रण जैसे रूपों में सामने आता है। इसमें सैन्य उपस्थिति अब अंतिम विकल्प की तरह बची है, पर उसका प्रभाव–– जैसे सैन्य गठबंधन, रणनीतिक साझेदारियाँ, और हथियारों के व्यापार लगातार बढ़ा है। अमरीका और चीन, रूस और नाटो, यूरोप और मध्य–पूर्व के सम्बन्धों में यह तनाव साफ दिखता है, जहाँ एक तरफ गहरी आर्थिक निर्भरता है और दूसरी तरफ भू–रणनीतिक दुश्मनी।

इस नव–उदारवादी ढाँचे में, राष्ट्र–राज्यों के बीच अन्तर्विरोध एक प्रकार की “प्रबन्धित अस्थिरता” बन गये हैं जिसे साम्राज्यवादी देश अपनी ताकत, तकनीक, कूटनीति और मीडिया के जरिये नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह अस्थिरता पूरी तरह मिटती नहीं, क्योंकि पूँजी का असमान विकास और प्रभुत्व की भूख तथा आर्थिक संकट आखिरकार किसी–न–किसी टकराव को जन्म देते ही हैं क्योंकि पूँजी निवेश का संकट निरन्तर, असमाधेय और ढाँचागत बन गया है। यही कारण है कि आज का नव–उदारवाद एक ऐसे संकट का दौर भी है, जहाँ सहयोग की सीमाएँ और टकराव की गहराइयाँ–– दोनों तेजी से उजागर हो रही हैं। साम्राज्यवादी देशों के अन्तर्विरोध अब पूरी मानवता को प्रभावित करने लगे हैं, चाहे वह पर्यावरणीय संकट हो, वैश्विक महँगााई हो, खाद्य आपूर्ति की असुरक्षा हो या युद्ध की आशंका।

नव–उदारवाद ने राष्ट्र–राज्यों के बीच सहकार की सतह बनायी है, लेकिन उस सतह के नीचे गहराती प्रतिस्पर्धा और अन्तर्विरोध ही इस व्यवस्था की अंतिम नियति तय करेंगे। और यही वह बिन्दु है, जहाँ क्रान्तिकारी हस्तक्षेप की सम्भावना प्रबल हो सकती है, यह बताने के लिए कि वैश्विक पूँजी और उसके राष्ट्र–राज्य का यह जटिल ताना–बाना मेहनतकश जनता के हित में नहीं, बल्कि उसके शोषण के विस्तार में रचा गया है, अन्त में ढह जाना इसकी ऐतिहासिक नियति और अनिवार्यता दोनों है।

(उप–सम्पादक से बातचीत के आधार पर लिया गया नोट)

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