स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा
इस साल की शुरुआत में, 14 जनवरी को बड़े–बड़े प्राइवेट अस्पतालों के मालिकों की चेन्नई में एक बैठक हुई थी। इसकी जो खबरें अखबारों में छपी थीं उनकी भाषा बड़ी लच्छेदार, बहुत प्रभावित करने वाली थी। ऐसा लगता था मानो सारे फाइव स्टार प्राइवेट अस्पतालों के मालिक भारत के लोगों के इलाज की चिन्ता में मरे जा रहे हैं और अब वे भारतीयों को चंगा करके ही मानेंगे।
जैसा कि होता ही है, पूँजीपति अपनी जहरीली बातें मोहक भाषा की चासनी में लपेटकर पेश करते हैं। असल में, इस बैठक में उन्होंने तय किया था कि भारत में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र से यानी लोगों का इलाज करके मोटा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसलिए इस क्षेत्र में पूँजी लगाकर इस पर कब्जा जमाना चाहिए। उन्होंने अनुमान लगाया है कि भारत में इलाज का कारोबार 372 करोड़ रुपये का है और इसमें खूब मुनाफा है। अपोलो हॉस्पिटल्स की श्रृंखला के मालिक तो इतने उत्साहित हैं कि आने वाले दो सालों में 6–7 नये ‘सुपर–स्पेशलिटी’ अस्पताल खोलने के दावे कर रहे हैं।
प्राइवेट अस्पतालों के मालिकों के मुनाफे की गारण्टी केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य बजट से हो जाती है जो लगातार घटता ही जा रहा है। इससे स्वास्थ्य सेवा का सरकारी क्षेत्र लगभग तबाह हो चुका है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक यह क्षेत्र चैतरफा संकट में फँसा है। पिछले पाँच सालों में रुपये की कीमत रसातल में पहुँच चुकी है। इसके बावजूद इस साल का केन्द्रीय स्वास्थ्य बजट भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी) 2017 के लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाया है।
प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की हालत तो और भी खराब है। सरकार साल–दर–साल सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के संसाधनों में कटौती करती गयी है। वीरान खण्डहर में बदल चुके अधिकतर स्वास्थ्य केन्द्र लोगों की इलाज की जरूरतें पूरी करने के बजाय स्मैकियों और जुआरियों का अड्डा बन गये हैं। सरकार की ही नीति के मुताबिक अस्पतालों में जितने बिस्तर होने चाहिए उससे लगभग चार गुना कम हैं। प्रति 1000 व्यक्तियों के लिए एक बिस्तर भी उपलब्ध नहीं है। भारत में प्रति 1000 व्यक्तियों पर पूरा डॉक्टर भी नहीं है, 0–73 डॉक्टर है। यह क्यूबा जैसे छोटे देशों का कोई मुकाबला नहीं कर सकता जहाँ यह प्रति 1000 व्यक्तिओं पर 8–43 डॉक्टर हैं।
राज्यों के आँकड़ें और भी निराशाजनक हैं। कई राज्यों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में बिस्तरों की उपलब्धता न के बराबर है। देश की 70 फीसदी आबादी देहात में रहती है, लेकिन जो थोड़े से बिस्तर हैं भी उनमें से 72 प्रतिशत शहरों में केंद्रित हैं। हालाँकि इनसे शहरियों की भी जरूरत पूरी नहीं हो पाती। देहात के करोड़ों मरीज सैंकड़ों मील दूर के शहरों के सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए अनगिनत मुसीबतें झेलते हैं। इनमें से शायद ही किसी को सही इलाज मिल पाता हो।
पहले से ही गाँव में शिशु मृत्यु दर, बच्चों और महिलाओं में कुपोषण से होने वाली बीमारियाँ और संक्रामक बीमारियों की दर शहरों से ज्यादा है। अब गैर–संक्रामक बीमारियाँ, जैसे– कैंसर, हृदय सम्बन्धी बीमारियाँ, शुगर, हाइपरटेंशन आदि में भी भारी बढ़ोतरी हो रही है।
सरकारी अस्पताल नहीं, डॉक्टर नहीं, चिकित्सा उपकरण और सुविधाएँ नहीं, दवाइयाँ नहीं, स्वास्थ्य क्षेत्र में जनता के लिए मोदी सरकार इससे बड़ी क्या आपदा ला सकती है ? और कॉर्पाेरेट अस्पतालों के मालिकों के लिए इलाज के नाम पर जनता को लूटने का भला इससे अच्छा क्या अवसर हो सकता है ? प्रधानमंत्री मोदी के ‘आपदा में अवसर’ के नारे की असलियत यही है।
हर साल महँगे इलाज के चलते करोड़ों लोग कंगाल हो जाते हैं। यह सिलसिला पिछले दो दशकों से जारी है। निजी अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर लोगों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है। गौरतलब है कि निजी अस्पतालों से इलाज लेने में सरकारी अस्पतालों से कम से कम 7 गुना ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। भारत में इलाज के लिए लोग पूरे खर्च का 50 प्रतिशत अपनी जेब से देते है। यह रकम पूरे देश के लोगों के लिए लगभग 17 हजार करोड़ रुपये आँकी गयी है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर बीमा कम्पनियों का वर्चस्व निजी अस्पतालों से इलाज के संकट को और भयावह बना देता है। भारत के शासक अपने अमरीका और यूरोप की नकल करके स्वास्थ्य बीमा मॉडल को भारत में ला चुके हैं। यह मॉडल इलाज जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी जनता को गरीब और अमीर में बाँट देता है। किसी व्यक्ति को इलाज मिलेगा या नहीं यह उसके बीमा प्रीमियम भरने पर निर्भर हो जाता है। जिस देश में अधिकांश जनता भयावह गरीबी की शिकार हो और बेरोजगारी चरम पर हो, वहाँ एडवांस में स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम भरकर इलाज कराने का मॉडल आम जनता को इलाज से महरूम कर देता है। यह सिर्फ अमीरों को मूलभूत और विशेष स्वास्थ्य सेवाएँ दे सकता है और बहुसंख्य जनता मूलभूत सेवाओं से भी वंचित कर दी जाती है और उसे साधारण इलाज की भी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
निजी कॉर्पाेरेट अस्पतालों और बीमा कम्पनियों का मुनाफा इस मॉडल के केन्द्र में है। इनके मुनाफे को बढ़ावा देने के लिए 2020 में नीति आयोग और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश भर के जिला अस्पतालों को निजी मेडिकल कॉलेजों से जोड़ेने की घोषणा की थी। इस पर अमल करते हुए इस साल सितम्बर में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की राज्य सरकारों ने अपने जिला अस्पतालों को निजी मेडिकल कॉलेजों को सौैंपने की शुरुआत कर दी है। इसकी सूचना में बताया गया है कि सरकार जिला अस्पतालों की कमान जिस निजी कम्पनी के हाथ में देगी उसे इलाज की पूरी कीमत वसूलने की छूट होगी और जमीन हथियाने की भी छूट होगी। यह नयी नीति पूरी तरह से ‘पब्लिक–फण्डेड’ है यानी जनता के पैसे पर टिकी हुई है। यह दो ऐसे राज्यों में लागू हुई है जहाँ चिकित्सा तंत्र की स्थिति देश में सबसे खराब है। जल्द ही इन राज्यों की गरीब जनता के पास सस्ती और अच्छी चिकित्सा हासिल करने का कोई तरीका नहीं बचेगा, चाहे वह शहर में हों या गाँव में।
सरकारी अस्पतालों को निजी हाथों में देने का प्रयोग पहले भी कई राज्यों में किया जा चुका है। सबका नतीजा यही रहा कि कुछ समय बाद ही राज्य के सरकारों को भारी कीमत चुकाकर इनका मालिकाना निजी कम्पनियों से वापस लेना पड़ा। एक बार नुकसान उठाकर केन्द्र सरकार फिर से यही नीति लागू कर रही है। जाहिर है, यह सब हमारे शासक अपने कॉर्पाेरेट के मुनाफे की भूख को मिटाने के लिए कर रहे हैं। किसी मुनाफा–केन्द्रित व्यवस्था में जनता की स्वास्थय जरूरतों को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। जनता की स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरतों की पूर्ति एक मानव–केन्द्रित व्यवस्था में ही सम्भव है। ऐसी व्यवस्था जिसमें लोगों का जीवन और स्वास्थ्य कुछ पूँजीपतियों के मुनाफे का साधन न होकर, अनिवार्य स्वास्थ्य सेवा एक मानव अधिकार हो।
–– कुशल