जनवरी 2025, अंक 47 में प्रकाशित

पराली, प्रदूषण और किसान

दिल्ली सहित देश के बड़े शहर प्रदूषण की भयानक मार झेल रहे हैं। पीआईबी के अनुसार, “यह समस्या मानसून के बाद और सर्दियों के महीनों में कम तापमान, कम मिश्रण ऊँचाई, विपरीत परिस्थितियाँ और स्थिर हवाओं के कारण प्रदूषकों के ठहर जाने से होती है। इनसे क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। पराली जलाने, पटाखे फोड़ने जैसी घटनाओं से होने वाला उत्सर्जन इस समस्या को और बढ़ा देता है।” प्रदूषण के असली कारणों पर पर्दा डालने के लिए पिछले कई सालों से मीडिया हरियाणा और पंजाब के किसानों को खलनायक बना रही है।

हालाँकि इस साल इसरो के पोर्टल पर पराली जलाने के सबसे ज्यादा मामले मध्य प्रदेश में सामने आये हैं। फिर भी गोदी मीडिया के निशाने पर केवल पंजाब और हरियाणा के किसान ही हैं। टीवी के प्रचलित न्यूज चैनलों में यहाँ तक कहा जा रहा है कि ये किसान षड्यंत्र रच रहे हैं और पराली 2 बजे के बाद जला रहे हैं।

दूसरी ओर दिवाली से होने वाले प्रदूषण को लेकर मीडिया का नजरिया कुछ अलग ही रहता है। हर साल सुप्रीम कोर्ट पटाखों पर कुछ बैन या नियंत्रण लगाता है, लेकिन यह केवल उनके फैसलों में ही नजर आता है। दिवाली की रात पीएम 2–5 का स्तर 603 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुँच गया, जो सुरक्षित सीमा (60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से 10 गुना अधिक था। दिवाली के अगले दिन दिल्ली का औसत एक्यूआई “बहुत खराब” की श्रेणी में था, और कई इलाकों में यह “गम्भीर” की श्रेणी तक पहुँच गया। पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध होने के बावजूद, इसका व्यापक उल्लंघन हुआ। जबकी इसे रोकने के लिए 377 टीमें बनायी गयी थीं। इस सब को ठेंगे पर रखकर कई इलाकों में पटाखे ॅफोड़े गये।

पराली जलाने वाले किसानों को हमेशा निशाना बनाया जाता है, जबकि गोदी मीडिया कभी यह नहीं दिखाता कि पराली के धुएँ के सबसे बड़े शिकार खुद किसान और उनके परिवार होते हैं। यदि आप कोई भी ग्राउण्ड रिपोर्ट देखें, तो पाएँगे कि पराली जलाना किसानों की मजबूरी है। लेकिन हमारे अन्नदाताओं को गोदी मीडिया एक दुश्मन की तरह पेश करता है। इस “नरेटिव” के जहरीले धुएँ के पीछे प्रदूषण के असली जिम्मेदार छिपा लिये जाते हैं।

25 नवम्बर को पीआईबी की वेबसाइट पर केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में कहा था कि “दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण कई कारणों से होता है। इनमें एनसीआर में उच्च घनत्व वाले आबादी क्षेत्रों में मानवजनित गतिविधियों का उच्च स्तर शामिल है, जैसे वाहनों से प्रदूषण, औद्योगिक प्रदूषण, निर्माण और विध्वंसक गतिविधियों से धूल, सड़क और खुले क्षेत्रों की धूल, बायोमास जलाना, नगर निगम के ठोस कचरे को जलाना, लैण्डफिल में आग लगाना और अन्य स्रोतों से वायु प्रदूषण।” इसके बाद वेबसाइट में ठोस आँकड़े भी दिये गये हैं, जिनमें पराली जलाने का स्थान बहुत नीचे है। इसके अलावा इसरो के मानक प्रोटोकॉल के अनुसार, “धान के अवशेष जलाने की घटनाओं की संख्या में साल दर साल उल्लेखनीय गिरावट देखी गयी है।”

 किसानों को दोषी ठहराना बहुत आसान है, वे व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर हैं। लेकिन पंजाब के शासकों को कोई दोषी नहीं कहेगा जिन्होंने 2009 में “पंजाब सबसॉइल वॉटर एक्ट” लागू करके धान की रोपाई का समय बहुत सीमित कर दिया है जिससे 10–15 दिन के अन्तराल में ही सारी फसल की कटाई होने लगी है। दुनिया के उन नियन्ताओं का भी कोई दोष नहीं निकालेगा जिनकी बनायी व्यवस्था पूरी पृथ्वी को तबाह कर रही है जिसने मौसम में महत्वपूर्ण बदलाव कर दिये हैं। किसान इस बदलाव के दोषी नहीं, बल्कि पीड़ित हैं इसके बावजूद उन्हें सजा दी जा रही है, खलनायक बनाया जा रहा है, जुर्माने थोपे जा रहे हैं, जेल भेजा जा रहा है।

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली को ‘गैस चैम्बर’ बनाने में आसपास के इलाकों में जलायी जा रही पराली के मुकाबले बेतहाशा वाहनों की भगदौड़ कहीं ज्यादा और सबसे अधिक जिम्मेदार है। यह तथ्य सेण्टर फॉर साइंस एण्ड एनवायरनमेण्ट (सीएसई) द्वारा 6 नवम्बर, 2024 को जारी किये गये एक अध्ययन का है। लेकिन कार मालिकों और ऑटो निर्माता कम्पनियों को कोई खलनायक नहीं बनाएगा, कोई उन्हें सजा नहीं देगा क्योंकि वे शासक वर्ग हैं।

दिवाली जैसे त्यौहार पर पटाखों से होने वाले प्रदूषण को धार्मिक भावना के नाम पर उचित ठहराया जाता है। दिवाली पटाखों का नहीं, बल्कि दीयों का त्यौहार है। वजह यह कि त्यौहार पर तड़क–भड़क न हो, त्योहारों का बाजारीकरण न हो तो कारोबारियों के माल कैसे बिकें, मुनाफा कैसे बढ़े। पटाखे फोड़नेवाले आमजन तो इनकी अधिकतम मुनाफे की लालसा का शिकार हैं जो धर्म की चासनी में लपेटकर परोसी जाती है। कारोबारी भी शासक वर्ग के लोग हैं, इन्हें भी कोई दोषी नहीं ठहराएगा। कुल मिलाकर सारा दोष निर्दाेष किसानों के मत्थे मढ़ा जायेगा।  

किसी शायर ने कहा है–– एक मुजरिम है मुनसिफ नुमा/ छोड़िये फैसला हो गया।

–– निहारिका

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