मूसी रिवरफ्रण्ट डेवलपमेण्ट: विकास के नाम पर आम जनता की बेदखली
“विकास के नाम पर हम अपनी जड़ों को नष्ट कर रहे हैं, जबकि पीछे छोड़ते हैं केवल इनसानी दुख और समाज पर पड़े घाव।”
यह पंक्तियाँ तेलंगाना सरकार द्वारा शुरू किये गये मूसी रिवरफ्रण्ट डेवलपमेण्ट प्रोजेक्ट के कारण हुई जनता की बेदखली के दर्द को जाहिर करने के लिए लिखी गयी थीं। पढ़ने में बहुत प्रभावी लगने वाली ये पंक्तियाँ सच्चाई को बयान नहीं करती, बल्कि उस पर पर्दा डालती हैं। लेखक ने बहुत खूबसूरती से शासकों को बचा लिया और हम सबको दोषी ठहरा दिया।
असल में हो यह रहा है कि सरकार और बड़े पूँजीपति अपने लाभ के लिए विकास के नाम पर हजारों गरीब लोगों के आशियाने उजाड़ रहे हैं। लेकिन इस परियोजना को भविष्य के सुनहरे सपने की तरह पेश किया जा रहा है। इस परियोजना का बजट सरकार ने 1–5 लाख करोड़ रुपये रखा है। इसके तहत हैदराबाद में मूसी नदी के किनारे 55 किलोमीटर लम्बा रिवरफ्रण्ट बनाया जायेगा। इसमें बड़े–बड़े आईटी टावर, शॉपिंग मॉल और मनोरंजन के केन्द्र शामिल होंगे। सरकार का दावा है कि इस परियोजना से हैदराबाद लन्दन जैसा और मूसी नदी टेम्स जैसी सुन्दर हो जायेगी। इसके साथ ही मूसी नदी को प्रदूषण मुक्त करने का दावा भी किया जा रहा है।
लेकिन, क्या 16 हजार परिवारों, जो वहाँ सालों से रह रहे हैं, जिनके पास अपने सारे दस्तावेज हैं, उनके आशियाने उजाड़े बिना यह परियोजना पूरी नहीं हो सकती ? बिल्कुल हो सकती है। नदी के किनारे रह रहे इन परिवारों के लिए वहीं पर फ्लैट बनाये जा सकते हैं।
अक्टूबर के शुरू में जब मलाकपेट की शंकर नगर कॉलोनी के 160 से ज्यादा मकान एक दिन पहले मौखिक सूचना देकर तोड़े गये, तो यह साफ हो गया कि यह ‘विकास’ सालों से नदी के किनारे बसे हुए लोगों के लिए विनाश ले आया है। इन्हें जबरन पिल्लिगुडिसेलु में बनी झुग्गी बस्ती में फेंक दिया गया, जहाँ वे अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सरकार ने दावा किया था कि दो–बेडरूम वाले 15 हजार मकान पुनर्वास के लिए तैयार किये गये हैं। लेकिन ये मकान शहर से बाहर हैं, जो प्रभावित परिवारों के पुराने घरों से 10–15 किलोमीटर दूर हैं। न तो इन इलाकों में रोजगार के अवसर हैं, न स्कूल, अस्पताल और बाजार की सुविधाएँ, और न ही कोई सुरक्षित माहौल।
सरकार का दावा है कि यह परियोजना मूसी नदी को प्रदूषण–मुक्त कर देगी। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि हर दिन हैदराबाद से दो अरब लीटर गन्दा पानी निकलता है, जिसमें से केवल 38 प्रतिशत का ही ट्रीटमेण्ट होता है। बाकी सारा गन्दा पानी मूसी नदी में ज्यों का त्यों बहा दिया जाता है। इस प्रदूषित पानी का बड़ा हिस्सा उद्योगों से आता है, जिसे रोकने या साफ करने का सरकार ने कोई इन्तजाम नहीं किया है।
इसके बजाय सरकार नदी किनारे बसी झुग्गी बस्तियों को प्रदूषण का जिम्मेदार ठहराकर उन्हें उजाड़ने लगी है। ऐसी बस्तियों की संख्या सोलह सौ से ज्यादा है जिनमें कई लाख लोग रहते हैं।
सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए जो मास्टर प्लान तैयार किया था, वह अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके बजट में भी बहुत फेर–बदल हुआ है। पहले इसकी लागत 58 हजार करोड़ रुपये बतायी गयी थी जिसे बढ़ाकर अब 1–5 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। सोचने वाली बात है कि यह विशाल धनराशि उसी आम जनता से उगाही जायेगी जिसके एक हिस्से को उजाड़ा गया है, और इसे चन्द पूँजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने के लिए खर्च किया जायेगा।
यह सिर्फ तेलंगाना की कहानी नहीं है। भारत के सभी हिस्सों में बड़ी परियोजनाओं के नाम पर गरीबों को उजाड़ा जाता रहा है। इनमें से किसी भी परियोजना में उजड़े परिवारों का उचित पुनर्वास नहीं किया गया। सरकार का विकास का मॉडल ‘सौन्दर्यीकरण’ और ‘आधुनिकता’ के नाम पर जनता को बलि चढ़ाना है। पाब्लो नेरुदा की कविता––
“वे हमें बताते हैं कि हमें निर्माण करना चाहिए,
लेकिन मैं निर्माण की कीमत जानता हूँ।
वे सड़कों और पुलों की बात करते हैं,
लेकिन मैं केवल तबाही के रास्ते देखता हूँ।
पत्थर और दीवारें खड़ी होती हैं,
जबकि विस्थापितों के दिल मलबे में दबे होते हैं।”
–– तस्मिया